Friday, January 28, 2005

मै सपने क्यों देखूँ?

मै सपने क्यों देखूँ?

जब यथार्थ सपनों सा हो,
और साथ मेरे अपनॊं का हो ।
मीठा मीठा दर्द मिल जाए जब यूँ ।

मै सपने क्यों देखूँ?

रातों की प्यारी सर्द हवायें
जब मेरे तन-मन को छू जायें ।
क्यों न एकटक मैं चाँद को लेखूँ ।

मै सपने क्यों देखूँ?

प्रात-किरण खिड़की से आकर,
गीत कोई जागृति का गाकर
पूछे, "क्यों सोई है तू?"

मै सपने क्यों देखूँ?


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