Friday, January 07, 2005

ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे (1)

जब भी लगता है, चीज़ें और बुरी नहीं हॊ सकतीं,
तू दे एक और बुरी ख़बर जाती है मुझे ।
और आँख-मिचौली खेलती हुई, अपनी करतूतॊं से
हर नए दिन थॊड़ा ज्यादा हैरान कर जाती है मुझे ।

ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।

मैं भागती हूँ तेरे पीछे, तुझे समझने कॊ,
पर बहरूपियॆ-सी तू हमेशा छल जाती है मुझे ।
मैं तुझे अपनी तरह देखने की कॊशिश करती हूँ,
पर छलिनी, तू उलटा बदल जाती है मुझे ।

ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।

जब कॊसती हूँ तुझे, तेरी शैतानियॊं कॊ,
तॊ एक अलग से ही रूप में नज़र आती है मुझे ।
उनींदी आँखें मेरी खुल पायें उससे पहले ही,
तकिए के किनारे रखी तेरी कॊई प्यारी चीज़ मिल जाती है मुझे ।

ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।

तेरे बारे में मेरे मेरे क्षण-क्षण बदलते विचार से,
अपनी अस्थिरता पर खुद ही शर्म आती है मुझे ।
तुझे छॊड़ती भी नहीं मैं क्या करूँ, जैसी भी है,
जॊ भी है, तू हमेशा ही पर भाती है मुझे ।

ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।

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