Sunday, February 20, 2005

मैं लिखती ही जाऊँगी

मैं लिखती ही जाऊँगी।

जाने कौन सा है समंदर
बह रहा जो मेरे अंदर।
कभी खाली नहीं कर पाऊँगी।
मैं लिखती ही जाऊँगी।

कभी मतलब का, कभी बेमतलब,
उमड़ता रहता है पर सब।
कहाँ इन्हें ले जाऊँगी?
मैं लिखती ही जाऊँगी।

आँसू होंगे हँसी होगी,
ग़म, कभी खुशी होगी।
सबका साथ निभाऊँगी।
मैं लिखती ही जाऊँगी।

विशाल विश्व, जटिल दुनिया,
मैं इसमें छोटी-सी चिड़िया।
कुछ कर ना शायद पाऊँगी।
पर लिखती ही जाऊँगी।

कोई शायद पहचानेगा,
कोई व्यर्थ ही मानेगा।
पर किसी का क्या ले जाऊँगी?
मैं लिखती ही जाऊँगी।

दर्द, हँसी, आँसू सब मिलकर,
जब खेल रचाएँ मेरे दिलपर।
लिख कर ही चैन पाऊँगी।
मैं लिखती ही जाऊँगी।

आभार उसका जिसने दी भाषा,
कलम ने पूरी की अभिलाषा।
उद्देश्य उनका निभाऊँगी।
मैं लिखती ही जाऊँगी।

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