Sunday, February 13, 2005

क्यों इतनी अकेली हूँ मैं?

सब कुछ होते हुए भी
क्यों इतनी अकेली हूँ मैं?

क़दम अकेले बढ़ाए मैंने कई बार,
पर्वतों-खाईयों को किया अकेले पार।
उतार-चढ़ाव ज़िन्दगी के
कितने ही झेली हूँ मैं।

और आज
सब कुछ होते हुए भी
क्यों इतनी अकेली हूँ मैं?

कभी उतरी एक देश अनजान,
निकली बाहर जब थी नादान।
और तब भी तनहाइयों से
हँसते-हँसते खेली हूँ मैं।

और आज
सब कुछ होते हुए भी
क्यों इतनी अकेली हूँ मैं?

3 comments:

Anonymous said...

Why do you think you are alone?
There are many alones like you in this or that part of world.
It was really a nice poem.
Touched something deep within.

Maha Devi Verma??
I loved her poems.

:)

Anonymous said...

JAYA JI
You have said everything about yourself in this composition.Am I correct?

naman chhabra said...

really good
from naman