Thursday, March 14, 1996

उपवास

वह था जन्माष्टमी का शुभ दिन,
कुछ धर्मात्मा बारह बजे के घंटे रहे था गिन,
कब जाकर उनकी भूख मिटे,
कब सर से यह भारी बोझ हटे।
उनमें से एक ने मुझे आवाज़ लगाई,
पास बिठा कर मुझको धर्म की बात बताई,
"साल में नहीं रख सकती थीं एक जन्माष्टमी का उपवास?"
मैंने इशारा किया उधर जिधर धर्मात्मा कर रहे थे बाप-बाप।
क्या जवाब दें यह सूझ उन्हें नहीं आई,
पर एक अनोखी बात मुझे याद आई।
हाल में एक समाचार आया है,
जिसने पत्थर तक का दिल दहलाया है,
एक भोली, बेक़सूर लड़की को निगल गई मौत की छाया है,
हफ़्ते में छह दिन उपवास रखने वाली माँ ने क्या सुंदर फल पाया है।
जाने क्यों यह उपवास ईश्वर को रास नहीं आया है,
इस सच्ची भक्ति का ईश्वर ने ये कठोर दंड सुनाया है।
जब सच्चाई की यह हालत है, तो ढोंग की तो है बात निराली,
दुरुस्तों का ठिकाना नहीं तो जान-बूझ कर किसने है बीमारी पाली?

No comments: