Sunday, January 13, 2008

मन के साथ भटकना होगा

मन के पीछे चलने वाले,
मन के साथ भटकना होगा।

हाँ, अभी देखी थी मन ने
रंग-बिरंगी-सी वह तितली
फूल-फूल पे भटक रही थी
जाने किसकी खोज में पगली।

पर वह पीछे छूट गई है
इन्द्रधनुष जो वह सुन्दर है
अब उसको ही तकना होगा।

मन के पीछे चलने वाले,
मन के साथ भटकना होगा।

बच्चों-सा जो कल सीधा था
और कभी किशोर-सा चंचल
आज वयस्कों-सा वह दूर, क्यों
रूप बदलता है पल-पल?

मन घबराए, गुस्सा आए
चोट लगे, आँसू आ जाएँ
हर कुछ को ही सहना होगा।

मन के पीछे चलने वाले,
मन के साथ भटकना होगा।

7 comments:

परमजीत बाली said...

बढिया रचना है।बधाई।

gajendra said...

GAJENDRA THAKUR Says:
April 29, 2008 at 1:29 pm
Jayaji,

I came through your blog and am humbly inviting to write for ‘VIDEHA’at http://www.videha.co.in/ Ist Maithili Fortnightly e Magazine. You can send your rachna/alochna to ggajendra@videha.co.in/ or ggajendra@yahoo.co.in/

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GAJENDRA THAKUR

Ambuj said...

वाह कितनी प्यारी पंक्तियाँ हैं, मन के पीछे चलने वाले मन के साथ भटकना होगा..

http://jhankar.wordpress.com/

Wandering in Light said...

superb....keep it up

Udan Tashtari said...

आपकी यह रचना निम्न पते पर किसी और के द्वारा छापी देख आश्चर्य हुआ. आपकी सूचनार्थ:

http://hindireader.blogspot.com/2008/11/blog-post_20.html

Jaya said...

धन्यवाद समीर जी। मैंने उस blog पर comment छोड़ा है। देखते हैं, आशा है कि सुझाव पर अमल हो जाए।

Anonymous said...

बच्चों-सा जो कल सीधा था
और कभी किशोर-सा चंचल
आज वयस्कों-सा वह दूर, क्यों
रूप बदलता है पल-पल?
vaah...