Monday, June 03, 1996

शिष्टाचार महान् है

शिष्टाचार,
सभ्य जीवन की आधार,
भला क्या है उसमें?
उसका सही रूप पाते हैं किसमें?
जिसके पास सबसे बड़ा झूठ-फ़रेब है,
वह ऐसा है जैसा अन्दर से सड़ा, ऊपर से लाल सेब है।
..................................... क्यों?
इसका भी जवाब लो।

एक व्यक्ति निरभिमानी,
जी हाँ, शिष्टाचार का धनी।
कोई पढ़ सके तो पढ़ ले उसका मन,
क्या सचमुच उसमें नही अभिमान?
है, मगर फिर भी वह शिष्ट है,
और यह समाज उससे नहीं रुष्ट है,
जो दिल की बात छिपा झूठ में खुद को तुच्छ कहता है,
और यह समाज दिल खोलकर रखने वालों से रुष्ट रहता है।

एक व्यक्ति निःस्वार्थी,
शिष्ट और परमार्थी।
क्या है उसमें परमार्थ सही?
क्या सचमुच उसमें स्वार्थ नहीं?
निःस्वार्थी बनने पर समाज में मिलती इज्जत का भी नहीं?
उस लोक में जाने पर ईश्वर की मोहब्बत का भी नहीं?
बेशक़ यह भी है ख़ुदगर्ज़ी,
पर समाज के लिए ये है इन्सानियत की मर्ज़ी।

लेकिन........................................ फिर भी

यह शिष्ट आचार है,
सभ्य जीवन की आधार है,
बग़ैर इसके जीवन निराधार है,
एक हद तक सत्य का बलिदान है,
फिर भी मानते आए हैं, और ज़बर्दस्ती भी मानना पड़ेगा,
शिष्टाचार महान् है।

1 comment:

AB said...

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