Monday, October 14, 2013

हम हर शहर से अजनबी हैं

रुकते बस कभी कभी हैं
हम हर शहर से अजनबी हैं।

गुल खिलते, मुरझा जाते हैं
सब खाक़ के हमनशीं हैं।

ख़्वाबों से भी गायब वो
ख़ूबसूरत माहज़बीं हैं।

नहीं हमारा हक़ लेकिन
जन्नत में कमी नहीं है।

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