Saturday, December 25, 2004

कुछ पीछे छोड़ तो आई हूँ ।

कुछ पीछे छोड़ तो आई हूँ ।

कुछ पिछड़े हुए क़ायदे थे,
कुछ बेवकूफ़ी भरे वादे थे ।
उन्हें छोड़ा ठीक, पर एक सरलता भी थी
उससे भी नाता तोड़ तो आई हूँ ।

कुछ पीछे छोड़ तो आई हूँ ।

आँसू व्यर्थ में निकलते थे,
लोग बेकार ही चिन्ता करते थे,
पर उनके पीछे अपनापन भी था,
अब मैं नहीं जोड़ जो पाई हूँ ।

कुछ पीछे छोड़ तो आई हूँ ।

सर हमेशा झुकाना पड़ता था,
आवाज़ को क़ाबू मॆं लाना पड़ता था,
पर लड़खड़ाने पर किसी का हाथ तो बढ़ता था,
उससे भी मुँह मोड़ तो आई हूँ ।

कुछ पीछे छोड़ तो आई हूँ ।

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