Wednesday, July 25, 2007

सवाल

सवाल कईयों ने पूछे हैं,
मैं पहली नहीं हूँ।
सवाल सभी पूछते हैं,
मैं अकेली नहीं हूँ।

पर बहुत से लोग
सवाल पूछ-पूछ कर थक गए।
जवाब मिलने की तो छोड़ो
कोई अलग रास्ता तक न सूझा।

उसी लीक पर चलते गए।

और मैं?

क्या कम-से-कम
अलग रास्ता अपना पाऊँगी?
या यों ही अपने सारे सवाल लिए
एक दिन ख़ुद भी चली जाऊँगी।

6 comments:

Swati said...

hi Jaya,

came across your site while i was googling for something. you write really well!!

Ashutosh said...

जया ,

जीवन का मतलब मात्र लीक पे चलना और प्रकृति, समाज, मन के बंधनो में उलझ के रह जाना ही नही है । एक बुद्धिजीवि का संघर्ष इसी फ्रेम में रह कर इसके बाहर कि सोचना है ।

ग़ालिब ने कहा है -

हमको मालूम है जन्नत कि हकीकत फिर भी ,
दिल कि खुश-रत में ग़ालिब ये ख़्याल अच्छा है ।

हम ना वास्तविकता बदल सकते है और ना ही परिस्थिति , जो हम बदल सकते है वो है मायने ।

- आशुतोष
http://anubhutiyaa.blogspot.com/

Anonymous said...

jayaa, you can very well find your answers provided your satisfaction/expectation quotient is low. People who are in search of perfection never reach their goal. But it's really good to keep enquiring. Good writings.

Anonymous said...

NICE POEM

parul said...

you write very well jaya.. keep it up!

Ankit said...

wow