Friday, December 29, 2006

कौन सा है रास्ता जो यों मुझे बुला रहा?

कौन सा है रास्ता जो यों मुझे बुला रहा?
धुंधला ये स्वप्न मुझे कौन है दिखा रहा?

बदली कई बार मग़र राह अभी मिली नहीं
चलने को जिसपर मेरा मन कुलबुला रहा।

बैठी थी यों ही, पर वैसे ना रह सकी
सफ़र कोई और है जो मुझे बुला रहा।

यहाँ-वहाँ, कहीं-कोई, झकझोर सा मुझे गया
कोई है सवाल जो पल-पल मुझे सता रहा।

2 comments:

Pratik said...

आपकी यह कविता मन को छ गई। लगता है मानो यह कविता मेरे मनोभावों को भी व्यक्त कर रही है।

Anonymous said...

vimal.....har rasta tumhara hai.har chah hai tumhari .....'kuch or nahi tumko sochne ki hai bimari.| yanha, wanha ,kanhi ,koi , jhakjhor sa gaya...? kuch nahi tha wo, pair tumhara apni parchhai par aa gira... dar gaye aap best kavita hai aapki