Tuesday, January 29, 2002

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

बहुत टूट जाती हूँ,
बहुत थक जाती हूँ,
लड़खड़ा कर गिरते-गिरते सहारे के लिए
लाठी एक मिल जाती तो है।

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

विश्वास नहीं रहता,
कोई तर्क नहीं चलता,
पर टूटते हुए मन में कई बार
बिजली सी चमक जाती तो है।

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

खून और लोथड़ों से भरा युद्ध क्षेत्र,
विवशता और आँसू से भरे नेत्र,
मगर विध्वंश की इस बेला में सृष्टि
नव-निर्माण के गीत गुनगुनाती तो है।


कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

विज्ञान में विध्वंश है,
मानव में दैत्यांश है,
पर कुरुक्षेत्र के प्रेरक कृष्ण की प्रेमलीला
एक आशा दिला जाती तो है।

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

क्लांत मन, हताश प्राण,
अंतर से निकल चुकी जान,
पर मृत्युदूत के आने से पहले ही
एक रोशनी झलक जाती तो है।

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

मृत्यु का गान है,
अंत का फरमान है,
पर अँधेरी सुरंग में कभी
शमा एक झिलमिलाती तो है।

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

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