Tuesday, April 23, 1996

हमारी भावनाएँ

हमारी भावनाएँ
   बेकद्र-सी पड़ी हुई हैं,
   दुनिया अपनी जिद पर अड़ी हुई है।

हमारी भावनाएँ
   भला कौन उसे समझेगा,
   हमारे मन की गुत्थम-गुत्थी को कौन बूझेगा?

हमारी भावनाएँ
   क्या उनसे जुड़ा है सम्पत्ति का अधिकार,
   ऐसा निकृष्ट सोच से मन कर उठा हाहाकार।

हमारी भावनाएँ
   उन्हें कुंठित करने का काम किसने किया है,
   दब्बू व्यक्तित्व का ये बोझ लाद किसने दिया है?

हमारी भावनाएँ
   ये ही बना दी गई है कि अगले कुछ वर्षों में,
   पैसे, गहने, मेहनत के खर्चों में,
   सारे पुराने रिश्ते टूट जाएँगे,
   सुनहले सपने हमसे रूठ जाएँगे।

हमारी भावनाएँ
   ये सुन उनमें भर गया था हर्ष.
   मनाया गया था कुछ समय पहले बालिका-वर्ष.
   पर ये हर्ष अब विषाद हो चुका था,
   दु:ख, पतन अवनति की गाद हो चुका था,
   जिसमें हमारी भावनाएँ और हम फँस चुके हैं,
   क्योंकि समाज-निर्माता भेदहीन समाज रच चुके हैं।

Friday, April 19, 1996

शिकायत

इस दुनिया में सभी को सभी से शिकायत है,
शिकायतें करने की हमारी शायद बन गई आदत है,
मुझे आपसे, आपको मुझसे,
सच को झूठ से, झूठ को सच से,
शिक्षक को छात्र से, छात्र को शिक्षक से,
परीक्षक को परीक्षार्थी से, परीक्षार्थी को परीक्षक से,
आदमी को दुर्भाग्य से, दुर्भाग्य को सौभाग्य से,
पानी को आग से, उपभोक्ता को त्याज्य से,
बच्चों को बड़ों से, बड़ों को बच्चों से,
चोरों को अदालत से, नेताओं को सच्चों से,
मुलायम को लालू से, आडवाणी को राव से,
मानो खुशी को प्यार से, या दुख को घाव से,
सहेली को सहेली से, दोस्त को दोस्त से,
मानो पानी को जल से और मांस को गोश्त से,
पर दोस्तों,
जिसको शिकायत जिससे भी है,
उसका जीवन उससे ही है।
कैकेयी न होती, तो राम की महानता कहाँ,
दशरथ न होते, तो उनकी पितृभक्ति कहाँ,
लक्षमण न होते, तो भ्रातृ-प्रेम कहाँ,
और रावण न होता तो उनकी शक्ति कहाँ?

अपोज़िशन न हो, तो सरकार की महत्ता कहाँ?
जनता न हो तो उसकी सत्ता कहाँ?

अत:, छोड़ो शिकायतें हो लो साथ,
मिल जाओ सब, मिला लो हाथ,
पर यह हाथ दो-मुँहा न हो,
कुतर खाने वाला कोई चूहा न हो।

Monday, April 15, 1996

वो बस

वो बस,
   कितनों की आशाओं की पूरक थी,
   आशाएँ पूरी करने की एक मात्र सूरत थी।

वो बस,
   कितनी ही खुशियों का उल्लास थी,
   वो खुशियाँ बन चुकी एक लाश थीं।

वो बस,
   कितनी ही माओं की आस थी,
   बस पहुँचने की लगी एक प्यास थी।

वो बस,
   कितने ही सपनों का मंदिर थी,
   पर सपनों के खून की चीख सुनने में बधिर थी।

वो बस,
   कितनी ही दुल्हनों का स्वप्न थी,
   क्या पता उन्हें स्वप्नों की होने वाली मृत्यु की रस्म थी।

वो बस,
   कितने ही प्रतीक्षारत भाइयों का अरमान थी,
   जिनकी बहनें ले कर आने वाली राखियों का फरमान थीं।

वो बस,
   कितनी ही दादियों का पोते का मुँह देखने की इच्छा थी,
   इतना ही नहीं, वो बस हमें भी दे चुकी एक शिक्षा थी।

वो बस,
   कितनी ही अभिलषाओं की कब्र थी,
   शायद किसी के बच जाने की भी सब्र थी।

वो बस,
   दुर्घटनाग्रस्त हो चुकी थी,
   क्योंकि आदमी के बोझ से त्रस्त हो चुकी थी।

वो बस,
   कल अपने विकृत रूप के साथ अखबार में आने वाली थी,
   परसों वो ख़बर पुरानी हो जाएगी, पर ज़रूर सोचूँगी दिल के किसी कोने में जगह खाली थी।

वो बस,
   अपने में समेटे थी कितने ही घरों की व्यथा,
   और उस व्यथा से अभिभूत हो मैंने लिखी है ये कविता।

Sunday, April 14, 1996

खुश कौन है?

दुनिया में खुश वही है,
    जो है जान कर भी अनजान,
    जो है समझ कर भी नादान,
    जो सदस्य होकर भी मेहमान।

दुनिया में खुश वही है, 
    जिसके लिए नहीं है कोई समाज, 
    जिसके पास रहता है एक साज, 
    जो बजाता है सिर्फ अपना राग।

दुनिया में खुश वही है, 
    जिसे किसी से नहीं है मतलब, 
    जिसके लिए कुछ नहीं ग़ौर तलब, 
    जिसके लिए "मैं" में सिमटा है सब।

दुनिया में खुश वही है, 
    जिसकी रहती हैं आँखें बंद, 
    जिसके लिए एक हैं दुनिया के रंग, 
    जिनसे कोई अलग नहीं, ना ही कोई संग।

दुनिया में खुश वही है, 
    जो शायद कुछ करता नहीं, 
    किसी के दुख में आहें भरता नहीं, 
    कभी खुशी में हँसता नहीं।

हाँ, दुनिया में खुश वही है,
जिसके लिए हर चीज सही है,
जिसे किसी से कुछ नहीं मतलब,
जिसके लिए कुछ भी नहीं ग़लत।

Wednesday, April 10, 1996

तुम क्यों मौन हो?

मानव! मैं तुम्हारे नज़दीक आना चाहती हूँ,
क्या तुम आने दोगे?
एक खुशी, एक आनंद पाना चाहती हूँ,
क्या तुम पाने दोगे?
"हाँ" कहने वाले! क्या तुम मनुष्य हो?
जिसकी शीश हिमराज से ऊपर हो उसके तुल्य हो।

मानव! मैं तुम्हें जानना चाहती हूँ,
क्या तुम जानने दोगे?
तुममें शक्ति है यह मानना चाहती हूँ,
क्या तुम जानने दोगे?
"हाँ" कहने वाले! क्या तुम सच्चे मनुष्य से शांत-धीर हो,
अहिंसा से जग को झुका सकने वाले वीर हो?

मानव! मैं तुमसे कुछ अच्छा सीखना चाहती हूँ,
क्या तुम सीखने दोगे?
तुम्हारे ज्ञान को अपने दिल-ओ-दिमाग पर लिखना चाहती हूँ,
क्या तुम लिखने दोगे?
"हाँ" कहने वाले! क्या तुम्हारे पास सच्चे ज्ञान का दिया है,
नफ़रत की आग बुझाने वाले ज्ञान-जल को तुमने पिया है?

मानव! मैं तुमसे कुछ पूछना चाहती हूँ,
क्या तुम पूछने दोगे?
सिर्फ इतना, और मैं कुछ ना चाहती हूँ,
क्या तुम पूछने दोगे?
"हाँ" कहने वाले! बताओ तुम कौन हो?
अब बोलो, बोलो तुम क्यों मौन हो?

Tuesday, April 02, 1996

आदमी क्या है?

आदमी क्या है?
एक पुतली चलती-फिरती,
या एक लहर उठती-गिरती,
या एक हाड़-माँस की मिट्टी का ढाँचा,
जिसमें बना हुआ है हृदय-रूपी एक खाँचा,
जिसमें सबके लिए भरी हुई है नफ़रत,
सैनिक नहीं भरी है मानव-बम बनने की हिम्मत।
इतनी हिम्मत है उसमें कि दे सकता है शहादत,
पर उसमें वतन नहीं, द्रोहियों के लिए है मरने की आदत?

नहीं, ये मानव हो नहीं सकता,
जो मानव के दुख में रो नहीं सकता,
मानव के अंतर का नहीं यह रूप है,
अंतर्मन सुंदर पर उसका बाह्य रूप कुरूप है।
यह रूप बनाने वाला कोई मानव नहीं दानव है,
उसके षड्यंत्र में फँस गया ये मानव है,
मनुष्य रूप में पृथ्वी पर आकर मानव को कर रहा बर्बाद,
हमारी बर्बादी का जश्न मनाकर वह हो रहा आबाद,
उसने मानव की मानवता को सुला दिया है,
मानवता को दानवता में घोल-मिला दिया है,
उस दानव को हम जानते हैं,
वह दानव है हम मानते हैं,
फिर क्यों उसके चंगुल से हम छूटना नहीं चाहते हैं,
मानते क्यों नहीं उसके और हमारे जुदा-जुदा रास्ते हैं?
अब वक़्त आ गया है उठने का,
अब नहीं समय है रुकने का,
आज मानव को मानव से मोहब्बत सिखलानी है,
आगे बढ़ने की सही राह उन्हें दिखलानी है।

Friday, March 29, 1996

मेरा वो परिवार महान् था

जाने कैसे जीवन बीतता जाता है और यादें धूमिल पड़ती जाती हैं,
पर, कभी मुश्किलों में सहारा खोजते वक्त वो यादें बहुत आती हैं।
आज जब मैं अकेली रहती हूँ,
तो अपने उस जीवन, उस परिवार को याद करती हूँ,
जहाँ शायद कोई मेरी सगा अपना न था,
पर उनका स्नेह, वो प्यार कोई सपना न था।

वे बेगाने इन अपनों से अच्छे थे,
खून का रिश्ता न हो, पर मन के रिश्ते सच्चे थे,
उन रिश्तों में एक मिठास थी,
उन रिश्तों की ज़रूरत भी कुछ खास थी।

वे रिश्ते हवा-पानी की तरह महत्वपूर्ण थे,
रिश्तों की डोर से बँधे लोग अलग थे, पर एक दूसरे से मिलकर पूर्ण थे,
वे रिश्ते गंगाजल की तरह पवित्र थे,
जिसमें सभी एक दूसरे के विश्वासी मित्र थे।

उन रिश्तों में एक अनोखा बंधन था,
प्यार-मोहब्बत, दिल-ओ-दिमाग़ का संगम था।

उन रिश्तों की नींव पर हमने सुंदर मंदिर बनाया था,
जिसके भक्तों ने खुद के अंदर सागर-सा दिल पाया था,
उस अथाह दिल के अंदर सबके लिए स्थान था,
सच मैं सोचती हूँ मेरा वो परिवार महान् था।

Tuesday, March 26, 1996

संगीत

संगीत को गीत, वाद्य और नृत्य का मिलन बताने वालों!
संगीत लय-ताल में बँधा सिर्फ शब्द-समूह नहीं है,
"मन के भाव प्रकट करना" उसकी परिभाषा सही है।
संगीत का उद्गम-स्थल है आत्मा,
वही संगीत है जो हृदय-विकारों का कर सके खात्मा।
संगीत नारी के श्रृंगार का प्रतीक नहीं है,
जो तुम देते हो परिभाषा सटीक नहीं है।

संगीत का लिखित इतिहास बनाने वालों!
संगीत में लिखने की कोई चीज़ नहीं है,
संगीत में छिपी किसी सम्राट् की हार-जीत नहीं है।
मुश्किल ही नहीं असंभव है जानना कब हुआ इसका जन्म
क्योंकि जिस भाषा में ढालते हो, उसकी उम्र है कहीं कम।
संगीत सिर्फ किसी विरही का मीत नहीं है,
जो तुम लिखते हो इतिहास सटीक नहीं है।

संगीत की परिभाषा खोजने वालों!
संगीत की परिभाषा कोई लिख नहीं सकता,
स्वरूप इसका कभी कहीं मिट नहीं सकता,
तुम्हारे इस छल प्रपंच के संसार से दूर है,
इसे मिटा नहीं सकते, सुगंधित भावना का फूल है।
मनुष्य की तीव्र बुद्धि से इसका नाता नहीं है,
भावना-शून्य व्यक्ति कभी गीत गाता नहीं है।

Sunday, March 24, 1996

मैं भी हूँ एक माँ

लोग मुझे दुत्कारते हैं कि वह माँ सौतेली है,
ममता-शून्य क्योंकि अपने बच्चे के कष्ट की पीड़ा नहीं झेली है,
कैसे समझाऊँ, इस दुनिया में माँ से दूर मैं भी रह चुकी अकेली हूँ,
कुछ दिन माँ की गोद में मैं भी पली-बढ़ी-खेली हूँ।
जानती हूँ, बच्चे के जीवन में ममता का ऊँचा स्थान है,
सफल बनाने में उसके जीवन को माँ का योगदान महान् है,
मैंने भी महसूस किया है इस खालीपन को,
याद है मैंने कैसे सँभाला था मैंने मन को,
तब से किसी के जीवन में यह खालीपन नहीं चाहती,
तभी से इच्छा थी किसी अनाथ को माँ का प्यार दे पाती,
कल पहली बार उसे पूरा करने का मौका मिला था,
किसी के दिल में मेरी ममता का फूल खिला था,
पर आज उसे मसल कर दुनिया ने फेंक दिया,
मेरी ममता के केन्द्र इसने मुझसे छीन लिया,
आज वह माँ कहकर मुझसे लिपटता नहीं,
मुझे देखकर वो भोली-सी मुस्कान हँसता नहीं,
क्योंकि आज वह महान् हो गया है,
दुनिया की नज़रों में विद्वान् हो गया है,
दुनिया ने बता दिया है उसे अपने-पराये का अन्तर,
मैं पर जानती हूँ कोरा काग़ज़ है उसका अभ्यन्तर,
उस पर लोगों ने सौतेली माँ काले अक्षरों में लिख दिया है,
माँ-बेटे का सम्बन्ध सिर्फ खून से है, ये उसने सीख लिया है।

क्या सोच है इस दुनिया की, वाह! वाह!
भूल जाती है ये कि आख़िर मैं भी हूँ एक माँ।

Monday, March 18, 1996

मेरी सहेली

यो प्रश्न आज तक मेरे लिए है एक पहेली
जिसे ढूँढ़ती हूँ मैं कौन है वह सच्ची सहेली?

मैं नहीं चाहती केवल एक सहेली,
जो हो एक जानी समझी पहेली,
मुझे चाहिए कोई मेरा अपना,
जो कि सच हो न हो केवल सपना,
जिसके पास मन का अच्छा रूप हो,
भले ही उसकी चमड़ी काली कुरूप हो,
जो मुझे समझ सके,
और मेरे साथ रो-हँस सके,
जो मुझे पहचान सके,
मेरे अंतर की आवाज़ को जान सके,
मुझे सिर्फ मेरे ही रूप में मान सके,
जिसपर मैं विश्वास कर सकूँ,
आगे बढ़ने के लिए जिससे सहायता की आस कर सकूँ,
जो मेरी मुश्किलों का हल बता सके,
और मेरी मेहनत का फल दिला सके,
क्या इस संसार में कोई ऐसा मनुष्य है,
जो मेरी कल्पना के मित्र तुल्य है?
हे ईश्वर क्या मैं उसे कभी पा सकूँगी?
और उसे पा जीवन में सफलता के फूल ला सकूँगी?