Saturday, March 16, 1996

भारतीय इतिहास और विद्यार्थी

भारतीयों को गर्व हैं कि उनका इतिहास बड़ा लम्बा है,
पर हमारे लिए तो यो एक ऐसा मोटा खम्भा है,
जिसे तोड़ने हमारे कर्तव्यों में गिना जाता है,
हमें रास नहीं आता है,
और यही खम्भा गौरव बनाकर हम पर थोपा जाता है।
बहुत दुःख झेले भारतीयों मे अँग्रेजों के वक़्त इसकी तो हमें है अनुभूति,
पर, हाय! कोई हमारे दुःख से भी तो रखे सहानुभूति।
आज उनके दुःख पर हम आहें तो भरते हैं,
पर उनके नाम याद करने में जो हम मरते हैं,
उसे हमारे इतिहासकार शायद समझा नहीं करते हैं।

उन्होंने दुत्कारा अमरीका को क्योंकि तीन सौ साल ही पुराना देश है,
पर यारों, वो जानते नहीं हमारा कुछ अलग सा ही केस है।

हाय! कितना अच्छा है वहाँ के विद्यार्थियों को,
तीन सौ सालों को ही रटते हैं,
पर भारत का इतिहास हज़ारों साल पुराना है,
इसका ज़ुर्माना हम ही तो भरते हैं।

Thursday, March 14, 1996

उपवास

वह था जन्माष्टमी का शुभ दिन,
कुछ धर्मात्मा बारह बजे के घंटे रहे था गिन,
कब जाकर उनकी भूख मिटे,
कब सर से यह भारी बोझ हटे।
उनमें से एक ने मुझे आवाज़ लगाई,
पास बिठा कर मुझको धर्म की बात बताई,
"साल में नहीं रख सकती थीं एक जन्माष्टमी का उपवास?"
मैंने इशारा किया उधर जिधर धर्मात्मा कर रहे थे बाप-बाप।
क्या जवाब दें यह सूझ उन्हें नहीं आई,
पर एक अनोखी बात मुझे याद आई।
हाल में एक समाचार आया है,
जिसने पत्थर तक का दिल दहलाया है,
एक भोली, बेक़सूर लड़की को निगल गई मौत की छाया है,
हफ़्ते में छह दिन उपवास रखने वाली माँ ने क्या सुंदर फल पाया है।
जाने क्यों यह उपवास ईश्वर को रास नहीं आया है,
इस सच्ची भक्ति का ईश्वर ने ये कठोर दंड सुनाया है।
जब सच्चाई की यह हालत है, तो ढोंग की तो है बात निराली,
दुरुस्तों का ठिकाना नहीं तो जान-बूझ कर किसने है बीमारी पाली?

Tuesday, February 27, 1996

पोस्टमार्टम

उनके लिए कुछ नहीं था उस फूल में सिवाय पुंकेसर, स्त्रीकेसर व कुछ कोशिकाओं के,
पर, मेरे लिए उनके अंदर छिपे थे भाव उन माताओं के,
जो अपने बच्चे से बिछड़ने पर बिलखती हैं, रोती हैं,
और उन्हीं की याद में "चैन की नींद" सोती हैं,
बड़े प्रेम से ढूँढ़ा थे मैंने उसे उस वन में,
और उस फूल के बड़े पेड़ की कल्पना सजाई थी अपने मन में,
उसे देखकर वो भी चिल्लाए, "अरे! मिल गया।"
मैं चकित थी कि आख़िर हुआ क्या।
हाथ से झपटा ऐसे कि फूल मुझे मिला टूटा हुआ,
उन्हें किन्तु दुःख न हुआ, मानो जीत गए हों कोई जुआ।
उसी फूल की ज़रूरत थी उन्हें रिसर्च करने को,
चीड़-फाड़ करने को और अपने सफ़ेद कागज़ भरने को।
अपनी इच्छा पूरी की और उसे चीड़-फाड़ दिया,
उस ख़ूबसूरत फूल का पोस्टमार्टम कर मुझे लौटा दिया।
उन्हें शायद मिल गया था, हाँ, मिल गया था, एक नया हथियार,
और बस इसलिए देखती रही मैं कर न सकी गुस्से का प्रहार।
लोग आते था और उन्हें बधाइयाँ दे कर चले जाते थे,
पर वे लोग, हाँ, विद्वान् लोग, मेरे मन की थाह नहीं ले पाते थे।
वो फूल मेरे सामने सुना रहा था अपनी व्यथा-कथा,
और उसे प्रकट कर मन हलका करने के लिए मैंने लिखी है यह कविता।

Monday, February 26, 1996

एकता

भारत में एकता नहीं थी तो हो गया वह गुलाम,
पर आज भी देखने को मिल रहा है हमें इसका एक परिणाम।

सन् सत्तावन का विद्रोह जो सबने साथ नहीं किया,
गड़बड़ भी की और एक बुरा परिणाम हमारे लिए छोड़ दिया।

यदि एकता होती तो एक ही नेता का नाम आज याद करने को मिलता,
कम-से-कम उस कारण से, इतिहास पर से हमारा विश्वास तो न हिलता।

काश!
सबने सुधार आंदोलन एक साथ किया होता,
जब उद्देश्य एक था तो एक साथ जिया होता,
मैं गलत तो नहीं कह रही न!
क्यों छोड़ गए हमारे लिए एक ओर आर्य समाज, तो ब्रह्म समाज
क्यों बसाया एक ओर रामकृष्ण मिशन, तो प्रार्थना समाज।

इसलिए हे देश के विद्यार्थियों!
इनकी गलतियों से शिक्षा लो,
आतंकवादी बनो या सुधारक,
रखना सदा मन एक,
ताकि आगे आने वाली पीढ़ी को,
उठाने न पड़ें वैसे कष्ट जो,
आज तुम उठा रहे हो,
और पूर्वजों के अवगुण गा रहे हो।

Friday, February 16, 1996

बचपन

उन्हें आती है मधुर याद बचपन की,
स्वतंत्र, उन्मुक्त, भोले-भाले, स्वच्छंद जीवन की,
पर हमारे बचपन की कहानियाँ,
बस हैं मोटी पुस्तकों की कुछ निशानियाँ।

आज के बचपन में शरारतों की फुर्सत नहीं है,
क्योंकि कभी भी बच्चों को किताबें देती रुख़्सत नहीं हैं,
नंबर पाने की लगी ऐसी होड़ है,
मानो विद्याध्यन नहीं कोई खूनी दौड़ है।

कैसे रह सकता है यह बचपन भोला-भाला,
जब उन्हें नज़र आए सिर्फ घोटाला,
यह बचपन खुशियों का पैग़ाम नहीं, तनावों की दास्तान बना हुआ है,
इस बोझ को उतारने से पहले ही यह डरा-सहमा हुआ है।

कैसे याद आ सकती हैं उन्हें नानी-दादी की कहानियाँ,
जब चारों ओर मिलें सिर्फ बमों-बन्दूकों की निशानियाँ,
पहले भी होती थीं और आज भी हैं कहानियाँ,
पर आज इनमें परोपकारियों की महानता नहीं है, अपराधों की हैं  निशानियाँ।

हमारा समाज हमें दे रहा है ये कैसा बचपन?
स्वतंत्र, स्वच्छंद नहीं, बल्कि एक डरा सहमा जीवन।

Sunday, January 28, 1996

डर

जब देखने को मिलते हैं, एक ही चेहरे के दो विपरीत पहलू
समझ में नहीं आता मैं उनको कैसे सह लूँ?
आखिर कैसे ये लोग एक साथ नदी के दो किनारों का पानी पीते हैं,
ये मेरी समझ से बाहर है कि कैसे ये दोहरी ज़िन्दग़ी जीते हैं।
सच, अब तो डर लगता है, इन सभ्य लोगों के समाज से,
बिना कुछ बोले, चुपके-चुपके पीछे से झपटते इस बाज से,
हर किसी के अंदर छिपे किसी अनजाने-अनबूझे राज़ से,
सबों द्वारा बजाए जाने वाले इस ख़ूबसूरत, रहस्यमय, क़ातिलाना साज से,
हर मित्र पर किए गए अविश्वास से,
हर शत्रु से लगाई गई आस से,
हर आशा के आगे लगे "काश!" से,
एक-दूसरे के खून की लगी इस प्यास से,
कागज़ के टुकड़ों के लिए, जान के बैरी भाइयों से,
इस "उन्नत" समाज में व्यक्ति के जीवन पथ की खाइयों से,
तथाकथित सत्यवादी लोगों की बुराइयों से,
बाल के संग-संग चमड़े भी उधेड़ लेने वाले नाइयों से,
हर किसी के मुँह से निकलने वाले स्वर से,
और शायद सच बोलने पर न्यायपालक ईश्वर से।

Wednesday, December 20, 1995

हमारी माटी

ये माटी है हमारी, ये माटी है हमारी
ये ना केवल है मेरी, ना ही ये तुम्हारी

ज़ुल्म-ओ-सितम ने इस माटी को गर्त में है ढकेल दिया
कुछ नासमझों ने इसको पर्तों में है समेट दिया
पर्तों से इसको निकालने को आज हमको ललकारी।

कम-से-कम इतना तो करना ही है हमको यार मेरे
सोई हुई इस माटी को जगाना है यार मेरे
ये माटी हरदम से ही है मेरे यार बड़ी हितकारी।

प्रकृति

मुझे याद आती हैं, वो सब बातें
बुजुर्गों से जो सुनी थीं वो सब यादें।

रिमझिम-रिमझिम बारिश बरसना,
ज़ोरो से बादल का गरजना,
प्रकृति मेहरबान थी मानव पर,
दे डाला था उसने कोई वर।

पर,
मानव ने क्या किया?
कर डाला उसकी ही विनाश
हो जाएगा सत्यानाश
टूट गए हैं प्रकृति से हमारे सब के सब नाते
मुझे याद आती हैं, वो सब बातें

Tuesday, December 12, 1995

ख़ुद को पहचानो

अपनी प्रतिभा पहचानो,
मेरे देश के वीर जवानों,
तुम नहीं आए लड़ने-कटने,
तुम तो आए हो कुछ करने।

अपनी ताकत पहचानो,
मेरे देश के वीर जवानों,
तुम नहीं आए हाथ पर हाथ धरने,
तुम तो आए हो देश पर मरने।

अपनी विद्या पहचानो,
मेरे देश के वीर जवानों,
तुम नहीं आए सीधी सी ज़िन्दग़ी बिताने,
तुम तो आए हो दुनिया को राह दिखाने।

अपनी हिम्मत पहचानो,
मेरे देश के वीर जवानों,
तुम नहीं आए अँधेरे में सड़ने,
तुम तो आए हो बाधाओं से लड़ने।

अपनी क्षमता पहचानो,
मेरे देश के वीर जवानों,
तुम नहीं आए किनारों पर बैठने,
तुम तो आए हो गहरे पानी में पैठने।

अपनी योग्यता पहचानो,
मेरे देश के वीर जवानों,
तुम नहीं आए किसी के आगे झुकने,
तुम तो आए हो कभी न रुकने।

अपनी बुद्धि पहचानो,
मेरे देश के वीर जवानों,
तुम नहीं आए अंधविश्वासों में मरने,
तुम तो आए हो नई खोजों को करने।

Wednesday, November 15, 1995

बारिश

I

हाय रे यह बारिश
लगता है परमात्मा की
है गरीबों के ख़िलाफ़ साज़िश।

इधर हम खाते हैं,
गर्म-गर्म पकौड़े।
जिनकी फ़सलें बह जाती हैं
खाते हैं वो कोड़े।
हाय! ये छप्परों से टपकता पानी
दुःख देने में इनको जिसका नहीं है दुनिया में कोई सानी।
खुले आकाश के नीचे सोते हैं,
अपनी बदक़िस्मती पर रोते हैं,
दिन का चैन रातों का नींद खोते हैं,
अमीरों की प्यास बुझा ख़ुद पानी से तंग हो रोते हैं।

II

वो दिन की ज़ोरदार बारिश,
मन हर्ष-विह्वल हो उठा,
गर्मी का मौसम रो उठा।

मन प्राण हो गए पुलकित,
जो-जो थे अब तक विकलित,
अभी-अभी की धूप के बाद अब यह आती बारिश,
सब हो गए हैं विस्मित,
दिल हो गया है हर्षित,
मन हर्ष-विह्वल हो उठा,
गर्मी का मौसम रो उठा।

बादल हो गए हैं गर्जित,
धूप हो गई है लज्जित,
अभी ही अपना खेल दिखा कर मुँह छिपाकर है बैठी,
कृषक हो गए आनंदित
फसलें हो उठी हैं जीवित,
मन हर्ष-विह्वल हो उठा,
गर्मी का मौसम रो उठा।

प्रकृति से ये है निर्मित
कर देता है मन को पुलकित
प्रकृति का वरदान पाकर खुल उठी है छतरी,
गर्मी से हो निवृत्त,
वर्षा हुई स्थापित
मन हर्ष-विह्वल हो उठा,
गर्मी का मौसम रो उठा।