Friday, January 07, 2000

क्या मिला है तुम्हे?

क्या मिला है तुम्हें
इस पूरे तमाशे से?
शून्य में क्या कमी थी?
सम्पूर्ण तो था -
क्यों बनाए इंसान?
मनोरंजन के लिए?
जैसे कि इंसान मनोरंजन के लिए
जन्म देता है -
कहानियों को -
काल्पनिक, सुंदर, नाटकीय
और दिल बहलाता है अपना।
पर कैसा मनोरंजन?
ख़ुद को ही तो कष्ट देते हो -
इतना कुछ व्यवस्थित करने में।

तो क्या यह तुम्हारा पुरुषार्थ है?
जो तुम कुछ नया,
रचनात्मक करना चाहते थे?
और इसलिए
सृजन कर डाला पूरी सृष्टि का।

छोटे-छोटे खिलौने बनाए
और तुम्हारा पुरुषार्थ संतुष्ट हो गया -
क्या वैसे ही जैसे मानव का पुरुषार्थ
'आग' से लेकर परमाणु तक की ख़ोज हेतु
उसे प्रेरित करता रहा है?
क्या सचमुच
यह सब, सारा खेल
तुम्हारे पुरुषार्थ की ही तुष्टि है?
लेकिन क्या इसके लिए तुम्हारे दैत्य भाई काफी नहीं थे?
उनके किए विध्वंस का पुनर्निर्माण -
तुम्हारी रचनाशीलता को तृप्त नहीं करता?

या ये तुम्हारे अहं की तुष्टि है?
जब इंसान तुम्हारे आगे सिर झुकाता है,
खुशियों की भीख माँगता है,
तुम्हें अपना सर्वस्व बताता है,
तो तुम्हें आत्मगौरव महसूस होता है।
ठीक वैसे ही, जैसे कोई बच्चा
अपने शिक्षक के अधिकारों से परेशान,
अपने ही खिलौनों के समक्ष
शिक्षक बनकर
तुष्टि करता है अपने अहं की।
क्या यही है - इन सबका मूल?

लेकिन नहीं -
तुम्हें मैं मानवीय मनोविज्ञान पर
शायद नहीं तौल सकती -
तुम उत्तर देने को तो मिलोगे नहीं -
इसलिए चुप हो जाती हूँ आज -
लौट जाती हूँ अपनी दुनिया में -
अपने कर्तव्य-पथ पर -
लेकिन अगर मौत के बाद भी तुम मिलते हो -
तो ज़रूर पूछूँगी तुमसे -

क्या मिला है तुम्हें -
इस पूरे तमाशे से?

Tuesday, November 30, 1999

वो कौन है?

जीवन के अकेले मोड़ों पर,
सुख और दुःख के जोड़ों पर,
जिसे याद करती हूँ -
वो कौन है?

अनचाहे जब कुछ छिन जाता है,
अनपेक्षित जब कुछ मिल जाता है,
तब जिसका अस्तित्व महसूस करती हूँ -
वो कौन है?

किसी की बात जब चुभ जाती है,
कोई ग्लानि भीतर तक भर जाती है,
तब जिसका नाम जपती हूँ -
वो कौन है?

जब अंदर से टूट जाती हूँ,
हीनता से इपनी घुट जाती हूँ,
तब जिसकी सोच कर आह भरती हूँ -
वो कौन है?

जब सूर्य की ग़रमी ऊर्जा देती है,
चाँदनी की शीतलती सिर छूती है,
तब जिसका धन्यवाद करती हूँ -
वो कौन है?

अँधेरे के बाद जब मिलती है रोशनी,
जीवन में नहीं लगती कोई कमी,
तब जिससे आशीः माँगती हूँ -
वो कौन है?

Sunday, October 24, 1999

मन भर आता है

जब तक दूसरों पर दया कर सकती हूँ
तब तक मैं 'कवि' होती हूँ।
जब दया का पात्र बना ख़ुद को पाती हूँ मैं,
तो अंदर का कवि मर जाता है।

याद है ख़ुद ही मैंने लिखा था कभी
ऐसा होने पर प्रलय समीप होती है।
ना जाने प्रलय आएगी भी या नहीं,
पर भीतर का इंसान डर जाता है।

हाँ, यह वह क्षण है जब कल्पनाएँ
अपना अस्तित्व खोने लगती हैं
और मन, मस्तिष्क, सम्पूर्ण व्यक्तित्व
यथार्थ के तथ्यों से भर जाता है।

उपमाएँ नहीं सूझती, उत्प्रेक्षाएँ सरदर्द लगती हैं,
भाव और भाषा की सूक्ष्मता गायब सी होने लगती है,
यह वह क्षण है जब मनोरम आकाशा की सैर करता मन,
यथार्थ की तपी ज़मीन पर उतर कर जल जाता है।

नहीं जानती कि यह विकास है या विनाश,
न जाने सद्बुद्धि आ रही है या सरस्वती छिन रही है,
पर अतीत की सत्य-शिव-सुन्दर की कल्पना
याद आज कर मन भर आता है।

Friday, April 23, 1999

ख़ुद को ही जड़ बनाती

अगर वापस बुला सकती मैं
तो अपने बचपन को बुलाती,
अगर टोक कर रोक सकती मैं
तो भागते हुए समय को रोकती।

अगर ला सकती कुछ धरती पर
तो असीम-अनन्त आकाश को लाती,
अगर कुछ पा सकती मैं
तो आकाश के तारों को पाती।

अगर उजाला कर सकती मैं
तो सूरज को ही उतारती,
अगर शीतलता पा सकती मैं
तो चाँद की चाँदनी बटोरती।

लेकिन मैं जानती हूँ
कि मैं एक इंसान हूँ।
मेरी अक्षमता ही मेरा जीवन है,
पर खोज में बढ़ते जाना ही मेरा काम है।

ना जाने कब से चल रही हूँ,
ना जाने कब तक चलती रहूँगी।
नहीं जानती,
क्योंकि अगर जड़ किसी को बना पाती मैं
तो ख़ुद को ही जड़ बनाती।


Friday, March 19, 1999

क्योंकि मैं एक इंसान हूँ

अच्छा लगता है मुझे देखना
नए या अधखिले फूलों को।
अच्छा लगता है मुझे झूलना
सावन के झूलों को।

क्योंकि मैं एक प्राणि हूँ।

अच्छा लगता है मुझे निहारना
खुले, नीले आकाश को।
अच्छा लगता है सुनना पर्वतों से
टकरा कर लौटने वाली आवाज़ को।

क्योंकि मैं एक प्राणि हूँ।

अच्छा लगता है देखना यों ही
किसी भी चीज़ को एकटक।
अच्छा लगता है शांति से एकांत में
बिना कुछ किए बैठना देर तक।

क्योंकि मैं एक प्राणि हूँ।

अच्छी लगती मुझे बर्फ की
सौम्य, उज्ज्वल श्वेतिमा।
इच्छा होती है कि जाऊँ क्षितिज तक
जिसकी नहीं है कोई सीमा।

क्योंकि मैं एक प्राणि हूँ।

लेकिन माफ़ करना मुझे तू सौंदर्य!
माफ़ करना मुझे तू शांति!
समय बहुत दुर्लभ है मेरे लिए
दुर्लभ है मेरे लिए एकांति।

कर्तव्य मेरा मुझे पुकार रहा है,
अनदेखी उसकी मैं कर नहीं सकती।
उसके नियत कर्तव्य पूर्ण किए बिना
जीना तो दूर मैं मर नहीं सकती।

क्योंकि मैं एक इंसान हूँ।

Thursday, December 24, 1998

मैं समय हूँ

मैं समय हूँ,
अनादि-अनन्त,
तुम्हारी क्षमताओं से परे।

मैं ही हूँ वो
जिसने इस ब्रह्मांड को
बनाया है।
और स्वयं आगे बढ़ते हुए
इसे इस रूप में लाया है।

तुम नहीं जानते
कि 'बिग-बैंग' हुआ था या नहीं,
मैं जानता हूँ।
तुम नहीं जानते
कि कैसे बना था सूर्य,
मैं जानता हूँ।
तुम बस अनुमान लगा सकते हो
कि कैसे बनी, पिघली व
फिर से बनी थी पृथ्वी,
मैंने सबकुछ देखा है।

मैंने देखा है
मानवों का अवतरण इस धरती पर।
मैंने महसूस किया है
उन आदिमानवों के जीवन को
जिन्होंने सूर्य की चमक में
मेरा स्वागत किया था।
रात्रि का काला आवरण पहन
मैंने उन्हें डराया भी था।

क्यों मैं इतना क्रूर था?

क्योंकि यही मेरा कर्तव्य था।

क्योंकि इसी ने प्रेरित किया था
कारण और निदान की खोज को।
क्योंकि इसी ने उत्प्रेरित किया था
सभ्यता के विकास को।

हाँ, मैं वही समय हूँ,
जिसे उन आदिमानवों ने
रात और दिन से ज़्यादा टुकड़ों में
विभाजित नहीं किया था।
और जिसकी मार और सहारे से
तुम विकसित होते गये।
और आज इस अवस्था में पहुँच गए हो
कि मेरे छोटे-सो-छोटे अंश को
माप लेना चाहते हो।
तुम्हारी महत्वाकांक्षाएँ इतनी बढ़ गई हैं
कि तुम मुझे, समय को अपने वश में कर लेना चाहते हो।

मग़र याद रखो,
कि तुम मेरी पैदाइश हो,
मेरे अधीन हो।
मैं तुम्हारी महत्वाकांक्षाएँ नहीं कुचल रहा,
मैं तुम्हें पूरा मौका दूँगा
कि तुम मेरी शिला पर
कुछ ऐसे लेख लिख जाओ
जो कोई न मिटा पाए।
वैसे ही जैसे
अशोक, चन्द्रगुप्त और चाणक्य ने लिखे हैं।
वैसे ही जैसे
लक्ष्मीबाई, चेनम्मा, जॉन-ऑफ़-आर्क ने लिखे हैं।
वैसे ही जैसे
बहुत से औरों ने लिखे हैं।

यह तुमपर निर्भर करता है
कि तुम इन लिखने वालों की
श्रेणी में आना चाहते हो
या खो जाना चाहते हो
उन लाखों की भीड़ में
जिनका आज कोई
नाम तक नहीं जानता।
यह सब
तुमपर निर्भर करता है।
बढ़ो जहाँ तक बढ़ सकते हो।
मग़र याद रखो
कि तुम्हारी हर क्षमता से ऊपर
मैं समय हूँ,
अनादि-अनन्त।
मैंने बहुतों को अपना ग्रास बनाया है।
तुम भी उनमें से एक होओगे।
मैं समय हूँ,
अनादि-अनन्त,
तुम्हारी क्षमताओं से परे।

Monday, December 21, 1998

विरोधाभास

क्यों होता है इतना विरोधाभास
मेरी ही सोच में कल और आज?
तुम पूछते हो मुझसे अक्सर,
गर्वित होते हो प्रश्न अनुत्तरित पूछकर।

तुम मानो या ना मानो
मनवा तो नहीं सकती मैं।
पर यह सच है कि मैं आदमी हूँ, पत्थर नहीं,
इसलिए अक्सर बदलती हूँ मैं।

ज्ञानेंद्रियाँ अभी जीवित हैं मेरी,
नित नए-नए अनुभव कराती हैं,
मेरी समझ और मानसिकता में
इस तरह बदलाव लाती हैं।

नई चीज़ें गर अच्छी लगें
तो स्वीकारना मेरी आदत है,
शाश्वत सत्य कुछ है नहीं,
आज के सत्य की पूजा मेरी इबादत है।

जिस दिन सोच का यह लचीलापन
इंसानी दिमाग़ से ख़त्म हो जाएगा,
उस दिन के बाद न तो नए सिद्धांत जनमेंगे
ना ही कोई नया आविष्कार हो पाएगा।

उस दिन मानव सभ्यता के इंतकाल की
खुली और घोषित शुरुआत हो जाएगी।
विकास और उत्थान से जुड़ी उसकी क़िस्मत
उसी दिन से बर्बाद हो जाएगी।

Thursday, November 12, 1998

सपने और दिमाग़

"मुझे ये ज़मीं नहीं
वो आकाश चाहिए।
ये साधारण पत्थर नहीं
वो चाँद चाहिए।"

"ये आग नहीं चाहिए
मुझे सूरज को पकड़ना है।
नदी-झरनों का है क्या करना
मुझे आकाशगंगा में उतरना है।"

"ये पेड़, या फल-फूल नहीं
वे सारे तारे चाहिए।
पत्थर की मूर्ति नहीं, हैं ग़र तो
भगवान खुद ही हमारे चाहिए।"

-- मेरे सपनों ने कहा।

"मूर्ख ग़र सोचता है कि
क्षमताएँ हैं तेरे अंदर,
तो बना देता ना क्यों
धरती को ही तारों का घर।"

"आँखों से पर्दा हटा तो ज़रा तू,
चाँद भी पत्थर ही है मान जाएगा।
आकाशगंगा काल्पनिक है मानता न क्यों,
इन झरनों का आनंद कहीं और न पाएगा।"

"तारों की चमक अंधा बना सकती है,
फूलों की कोमलता का सकून और कहाँय़
ये आग जिसने पकाई थी पहली रोटी,
सूरज की प्रचंडता में है मान वो कहाँ?"

"ढूँढ़ना चाहता है भगवान को ग़र तू
झाँक अपने अंदर कुछ नहीं वो विश्वास है तेरा।
देख उनकी ओर जिनके सपने नहीं बचे,
आँखों में उनकी मिल जाएगा भगवान वो तेरा।"

-- मेरे दिमाग़ ने कहा।

Tuesday, November 10, 1998

कवि कैसे बने

जब अपने ही दिमाग़ में
बम फट रहा हो,
अपने ही सपनों का
क़त्ल हो रहा हो.
तो कश्मीर के प्रति
सहानुभूति कैसे आए?

बहुआयामिता से डरकर,
विविधताओं में उलझकर,
जब कोई अपना ही रास्ता
पाने ना पाए,
तो कवि कैसे बने वो?
दुनिया को क्या राह दिखाए?

जब अपनी ही क़िस्मत
उसे गरीब नज़र आए,
ओर भविष्य अंधकार का
दूसरा नाम वो पाए,
तो भिक्षुक और प्रतिहारिणी पर
कैसे वो दया दिखाए?

मानवता भविष्य बना नहीं पाती,
भावनाएँ रोटी दिला नहीं पाती,
इनकी हार के और निर्बलता के किस्से
हर वक़्त उसकी आँखों के आगे आएँ,
तो मानवता पर विश्वास कैसे करे वो,
कैसे वो पाए भावनाएँ?


Friday, November 06, 1998

तुम्हारे बाद

मंज़िलें हैं, रास्ते हैं,
दूरियाँ हैं, माध्यम है।
बस प्रोत्साहन नहीं है,
कहीं तुम्हारे बाद।

रिश्ते हैं, नाते हैं,
लोग अपने बनते जाते हैं,
पर अपनत्व नहीं है,
कहीं तुम्हारे बाद।

हवाई जहाज, रेलगाड़ियाँ हैं,
न कुछ हो तो बैसाखियाँ हैं,
एक सहारा नहीं है,
कहीं तुम्हारे बाद।