Tuesday, February 17, 1998

ये तो मेरा ही दिल था

किसी ने मुझे एक किस्सा सुनाया,
"चाँद से तो मैं लौट आया,
सारा विश्व सो घूम चुका मैं
पर उसे मैंने कहीं न पाया।"

"कई बार राहों में गुज़रते हुए
अक्सर गलियों में भटकते हुए
उसकी दर्द भरी चीख सुनकर
रुक गए पैर कुछ ठिठकते हुए।"

"ढूँढ़ा उसे मैंने चारों ओर
रात भर भी और हो गई भोर।
आवाज़ें आती रहीं मगर
मिला ना उसका ओर या छोर।"

"सोचा शायद मिट्टी में वो दबी हुई हो,
पददलित हो शायद वहीं पर वो पड़ी हुई हो।
खोदने की कोशिश की मैंने मिट्टी
लेकिन फिर भी मुझे मिली नहीं वो।"

"मैं चलता ही गया इस आशा में
कि किरण कोआ मिलेगी ही निराशा में।
रात तो कटेगी ही अभी या कभी -
साहित्य की ख़ूबसूरत भाषा में।"

"चारों ओर उसकी चीखें ही चीखें
उसे ढूँढ़ना कोई कैसे सीखे?
खीझ कर भी मैं थक गया था,
रुक गया वहीं मुठ्ठियाँ भींचे।"

"तभी कहीं से आवाज़ आई -
'सही जगह तुम ढूँढ़ नहीं पाए भाई।
मैं तो तुम्हारे ही भीतर छिपी हूँ,
भरना चाहती हूँ दिलों की खाई'।"

"अविश्वास, खीझ और लेकर संदेह,
पाना चाहते हो मुझको सदेह?
बताओ मैं कैसे आऊँ तुम तक
जब तुम दे नहीं सकते मुझे नेह।"

"खो चुके हो तुम अपनी पहचान
इसलिए नहीं पा सके मेरा निशान
जगाओ एक बार मेरी आत्मा को
पाओगे मुझे अपने मित्र समान।"

कहकर इतना वह हो गया चुप,
मैं भी चुप थी, वह भी मूक।
"आख़िर यह किस्सा किसका था?"
जवाब मिला - "मानवता।"

ध्यान से देखा मैंने,
"वह कथाकार कौन था?"
ये तो मेरा ही दिल था।

Wednesday, January 28, 1998

कल्पनाएँ होती क्या हैं?

पूछा है तुमने अक्सर मुझसे
कल्पनाएँ होती क्या हैं?
मैं पूछती हूँ जब कोई सहारा नहीं होता,
तो मुझे अपने में डुबोती क्या है?

जब तुम एक नए उभरते विचार को
दबाना चाहते हो,
जब तुम किसी नहीं बनती परिभाषा को
मिटाना चाहते हो,
जब अपने सामने तुम किसी को
महत्वहीन समझते हो,
जब अपनी उत्तराधिकृत चीज़ों के आगे
किसी के स्वत्व को हीन समझते हो,
जब किसी पर थोप कर अपनी त्रुटियाँ
उसे ग्लानि का अहसास दिलाना चाहते हो,
जब तुम अपनी श्रेष्ठता और उसकी हीनता को
विश्व में चिल्ला कर बताना चाहते हो.
जब देख अपनी सत्ता पर खतरा
तुम गैलीलियो को झुकाना चाहते हो,
जब अपना आसन डोलता देख
मीरा को ज़हर पिलाना चाहते हो,

तब तुम जन्म देते हो
कल्पनाओं को किसी के मन में,
जो एकमात्र सहारा बनती हैं
उसका इस जीवन में।

उसकी कल्पनाएँ उड़ान भरती हैं,
जहाँ सहमकर कोई रहता नहीं,
डरकर तुम्हारी सत्ता से हर कोई
तुम्हारी ही ज़ुबाँ कहता नहीं।

जहाँ हर एक की भावनाओं का
आदर हुआ करता है।
जहाँ प्रेम के बदले सबको
प्रेम मिला करता है।

जहाँ सब दूसरों की
अच्छाइयाँ स्वीकारते हैं,
गलतियाँ माफ़ करते हुए
वह दुनिया सँवारते हैं।

तुम उस अद्भुत दुनिया को
यथार्थ क्या, कल्पनाओं में भी नहीं पाओगे।
तुम 'स्व' और 'स्व-भाव' से चिपटे लोग,
असीम-अनंत कल्पनाएँ कहाँ से लाओगे।

तुम खुशी इसी में समझते हो
कि लोग तुम्हारी पूजा करें,
और भले ही पीछे मुड़ते ही
तुम्हारी पीठ पर थूका करें।

दूसरों की गलतियाँ माफ़ नहीं करते तुम
तो अपनी गलतियाँ कैसे माफ़ करवाओगे?
बताओ ना, जब तक तुम बोझ बने रहोगे यहाँ,
वह अद्भुत, सलोनी दुनिया कैसे ला पाओगे?

जब तक काँटेदार बाड़ों से निकल कर
वनफूलों को समझ नहीं पाओगे,
कल्पनाएँ होती क्या हैं,
कैसे तुम समझ पाओगे?

Friday, January 09, 1998

अव्यक्त और मौन

जब हर ओर अँधेरा होता है
और हाथ को नहीं सूझता हाथ.
उस वक़्त प्रकाश-पुंज बन आता है कौन?
तुम कहीं तो हो ही, अव्यक्त और मौन।

जब आत्मविश्वास रह नहीं जाता,
और कंधे थक जाते हैं भार से,
उस वक़्त आत्मशक्ति जगाता है कौन?
तुम कहीं तो हो ही, अव्यक्त और मौन।

जब किसी सहारे की ज़रूरत होती है,
और दोस्त कोई मिल पाता नहीं,
उस वक़्त अदृश्य एक हाथ बढ़ाता है कौन?
तुम कहीं तो हो ही, अव्यक्त और मौन।

जब खीझ और निराशा ही बचती है,
और ख़ुद से ही रूठ जाती हूँ मैं,
उस वक़्त चुपचाप ही मुझे मनाता है कौन?
तुम कहीं तो हो ही, अव्यक्त और मौन।

जब उलझनों में उलझ जाती हूँ,
और राह कोई दिखती नहीं,
उस वक़्त राह मुझे बताता है कौन?
तुम कहीं तो हो ही, अव्यक्त और मौन।

जब असफलताओं से हार जाती हूँ,
और संबल टूटने लगता है,
तब सफलता की एक भेंट दिलाता है कौन?
तुम कहीं तो हो ही, अव्यक्त और मौन।

जब हैवानियत से तबाह हो जाती हूँ,
इन्सानियत से विश्वास उठने लगता है,
उस वक़्त एक इन्सान से मिलाता है कौन?
तुम कहीं तो हो ही, अव्यक्त और मौन।

बताओ कहाँ ढूँढ़ू मैं तुम्हें,
ऊपर चमकते आकाश में,
या सातवें आसमान में,
या दुनिया के विकास में?

मंदिर में या मस्ज़िद में,
सगुण में या निर्गुण में,
सागर में या नदियों में,
धनी में या निर्धन में?

या कहीं और?
खुद तक पहुँचने को एक प्रकाश-पुंज दिखा दो,
या कोई अदृश्य हाथ बढ़ा दो,
या फिर से थोड़ा संबल दिला दो,
या थोड़ी सी आत्मशक्ति जगा दो।

तुम तक पहुँचने से मुझे रोक पाता है कौन?
तुम कहीं तो हो ही, अव्यक्त और मौन।

Thursday, November 27, 1997

मेरे दोस्त!

क्या करूँ ज़िन्दग़ी के उन दोराहों पर,
जहाँ ज़बान ही चुप हो जाती है।
दिमाग़ तो कुछ नहीं ही कहता है,
आत्मा भी जब मूक हो जाती है।

जब अतीत कुछ याद नहीं आता,
भविष्य की योजना नहीं बन पाती,
वर्तमान एक कशमकश हो जाता है,
और खुद से खुद की ही ठन जाती।

जब सब कुछ अनजाना लगता है,
और महसूस होता है अपना बौनापन,
जब कंधे ढो नहीं पाते
चुनौतियों भरा ये जीवन।

जब गुस्सा भिंची मुठ्ठियों में छिप जाता है
और आँसू मुँदी पलकों में रह जाते,
सपने और भावनाओं से डर-सा लगता है
और दिल-ओ-दिमाग भी साथ छोड़ जाते।

तब महसूस होता है मुझे मेरे दोस्त!
कि मुझे तुम्हारी ज़रूरत है।
कल्पना मात्र नहीं ये सब कुछ
यही जीवन की सबसे बड़ी हक़ीकत है।

नहीं जानती कि तुम्हारा काल्पनिक रूप
कहीं मूर्त है भी कि नहीं,
लेकिन किसी कोने में यह विश्वास है
कि भावनाएँ अभी मरी नहीं।

Saturday, September 27, 1997

भारतमाता!

भारतमाता!

शत्-शत् है नमन तुझे,
तन-मन है अर्पण तुझे।

भारतमाता!

खुद को ज्ञानी कहने से डरती हूँ,
पर फिर भी सोचने की कोशिश करती हूँ,
जब देखा होगा तूने सभ्यता का पहला उजियाला,
पहनी होगी पहली बार, महिमा-गीतों की माला।
कभी जन्मे होंगे कंस-रावण करने को संहार तेरा,
उतरे होंगे राम-कृष्ण भी करने को उद्धार तेरा।
वशिष्ठ, सांदीपनी देते होंगे
माता-सा ही मान तुझे,
करते होंगे तेरी वंदना,
"तूने ही दिया है ज्ञान मुझे।"
बढ़े होंगे फिर आर्य-पुत्र
संस्कृति के पुनीत पथ पर।
होती होगी तू आनंदित
संतानों की प्रगति लखकर।
क्योंकि तू ही वो होगी जिसने
प्राण से प्रिय बच्चों को अपने
तड़प-तड़प कर, बिलख-बिलख कर,
प्रकृति के कष्टों से लड़कर,
किसी-किसी तरह से जीकर,
मरते हुए देखा होगा।
जना होगा तूने जनक को,
स्वर्ण-युग भोगा होगा।
लिच्छवी गणतंत्र देखकर
अशोक-राज देखा होगा।
आए होंगे शक-कुषाण,
फिर ग्रीक-हूण आए होंगे।
थामकर तलवार हाथ में
तेरे बेटों ने देश-गीत गाए होंगे।
सबको समाती गई होगी तू,
सबको अपनाती गई होगी तू।
'वसुधैव कुटुम्बकम' का प्यारा
गीत गाती गई होगी तू।
बुद्ध-जीन ने भी उसी वक़्त
प्रेम-पाठ गाया होगा।
त्रिरत्न और अष्टांग का
मार्ग भी बताया होगा।
आया होगा बाबर भी फिर,
अकबर ने सिर झुकाया होगा।
हाकिंस के तुझपर क़दम पड़े,
भविष्य सोच दिल तो तेरा रोया होगा।
औरंगजेब ने क्रूरता से
तेरा दिल दुखाया होगा,
लड़ते देख बच्चों को अपने,
जी तो भर ही आया होगा।
बंगाल बना होगा कहीं,
कहीं मैसूर बनाया होगा,
तेरे ही बच्चों ने तेरे अंग-अंग को
बाँट-बाँट कर नाम अलग बताया होगा।
दरारें पड़ गई होंगी
होगी तू अपनों की मारी।
बीच में घुसी होंगी बेड़ियाँ
होगी असहाय तू उनसे हारी।
रोती होगी क़िस्मत पर तू,
"गया कहाँ अब मान मेरा?"
चिल्लाती होगी बच्चों को,
"बहुत हुआ अब जाग ज़रा।"
टकराकर पत्थर से आवाज़ें
तुझ तक ही वापस आती होंगी,
रोकर बच्चों की दुर्दशा पर कोई
शोक-गीत तू गाती होगी।
ढूँढ़ती होंगी तेरी आँखें,
किसी आर्य को, किसी गुप्त को,
जगाना चाहती होगी तू
भारतीयों के हृदय सुप्त को।
जन्मा होगा कोई तिलक फिर
उतरा होगा कोई गाँधी,
झेली होगी भगत सिंह ने
अपने ऊपर तेरी आंधी।
उपजा होगा उत्साह नया
रंग वही लाया होगा,
गुम हुई स्वाधीनता को
तूने फिर पाया होगा।
अब तक के इतिहास में तूने
मानव की मानवता देखी होगी,
दानवता भी भोगी होगी
देवत्व की गोद में तू लेटी होगी।
आर्यपुत्रों का पतन देखा होगा तूने,
मानव को दानव में बदलते देखा होगा,
डरकर इन परिवर्तनों से संभवतः तेरा कोई
पुत्र तेरी गोद में आकर भी लेटा होगा।
ख़ैर! अंत मे एक दिन तूने
मंज़िल एक पाई होगी,
होकर प्रफुल्लित एक बार फिर
तू प्रेम-गीत गाई होगी।
पाकर स्वीधीनता तूने
सपने नए सँजोए होंगे,
सपनों को पूरा करने को
आशा-बीज बोए होंगे।

भारतमाता!

किन्तु सच-सच बतलाना मुझको
क्या स्वप्न-लोक वह चूर हो गया?
आशाओं का रूप वो तेरा
क्या काल्पनिक एक हूर हो गया?
शायद सच!
झटका लगा था ना तुझको
जब अंग तेरा एक भंग हुआ था?
रोई थी न तू बहुत ही
जब मिट्टी का लाल रंग हुआ था?
रोती है न आज भी बहुत
सुनकर तू खेल उनके?
धिक्कारती है न ख़ुद को ही तू
देख कपूतों के मेल अपने?
'इंडिया, नथिंग बट रबिश' जब सुनती है तू
टीस तेरे दिल में उठती है न?
जब अखबार होते हैं काले, काले कारनामों से
तब शर्म से नज़रें तेरी झुकती हैं न?
जब मुकुट पर तेरे चलती है गोलियाँ
तो नसें दिमाग़ की फटती हैं न?
लाता है सागर जब कुसंसकृति का ज़हर
तो पहचान तेरी मिटती है न?

भारतमाता!

दे-दे बस अपना आशीर्वाद।
दे-दे अपनी कृपा का प्रसाद।
शक्ति दे तू इतनी मुझको,
ढूँढ़ पाऊँ मैं चन्द्रगुप्त,
सिकंदर को हराने को उठा सकूँ मैं
उन हृदयों को जो पड़े हैं सुप्त।
या फिर ख़ुद ही बन जाऊँ मैं
विवेकानंद या बुद्ध महान्।
जयचंद का भूत भगाकर
बन जाऊँ खुद ही चौहान।
हो एक बार फिर विश्व में
तेरे ही ज्ञान की विजय।
ताकि हम फिर पुकार पाएँ
"भारतमाता! तेरी हो जय!"

Friday, August 08, 1997

झुक जाती हूँ मैं

सुना है हर प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ना विज्ञान है,
आज के युग में संभवतः सबसे बड़ ज्ञान है,

लेकिन अपने प्रश्नों के जवाब देने में
इसे जब समर्थ पाती हूँ मैं,
तो तुम्हारे आगे झुक जाती हूँ मैं।

देखी है मैंने शामों में वो बादलों की कालिमा,
चमकती है कैसी उसपर सूर्य की लालिमा,

लेकिन इनकी उपमा देने के लिए
अपनी पहुँच की कोई चीज़ नहीं पाती हूँ मैं,
तो तुम्हारे आगे झुक जाती हूँ मैं।

जब जानती हूँ कि सामने कोई मुझसे कमज़ोर है,
और मेरे आगे चल नहीं सकता उसका ज़ोर है,

फिर भी जब उसे ख़ुद से ही
जीतता हुआ पाती हूँ मैं,
तो तुम्हारे आगे झुक जाती हूँ मैं।

जब संसार मान लेता है मुझे विजयी,
जीत पाती जाती हूँ रोज़ नई-नई,

लेकिन ख़ुद से ख़ुद के ही द्वंद्व में
जब ख़ुद को हारती पाती हूँ मैं,
तो तुम्हारे आगे झुक जाती हूँ मैं।

दुनिया के संग मैं भी पहुँच सकती हूँ चाँद पर,
छूने की कोशिश कर सकती हूँ सूर्य को अपनी आन पर,

मगर एक और सूर्य या चन्द्रमा बनाने में
जब असफल हो जाती हूँ मैं,
तो तुम्हारे आगे झुक जाती हूँ मैं।

उम्र की निशानी चेहरे पर से हटा सकती है आज की दुनिया,
इतनी सक्षम है वो कि चेहरे को कर सके नया,

लेकिन जन्म, जरा और मृत्यु पर
जब उसका कोई वश नहीं पाती हूँ मैं,
तो तुम्हारे आगे झुक जाती हूँ मैं।

सूर्य है आग, ये चन्द्रमा है पत्थर,
बादल और बिजली से भी नहीं कोई डर,

लेकिन जलते सूर्य, चमकते चन्द्रमा और घूमती पृथ्वी
का शक्ति-स्रोत पता नहीं लगा पाती हूँ मैं,
तो तुम्हारे आगे झुक जाती हूँ मैं।

कुछ स्विचों से रोबोट चला सकती हूँ मैं,
एटम बमों से दुनिया को हिला सकती हूँ मैं।

लेकिन एक दुनिया क्या, एक इन्सान भी
बनाने में जब असमर्थ ख़ुद को पाती हूँ मैं,
तो तुम्हारे आगे झुक जाती हूँ मैं।

बड़ी-बड़ी समस्याएँ सुलझा सकती हूँ मैं,
अपनी बुद्धि से दुनिया को उलझा सकती हूँ मैं।

लेकिन जब अपने भीतर के ही प्रश्नों में
उलझती चली जाती हूँ मैं,
तो तुम्हारे आगे झुक जाती हूँ मैं।

Friday, June 06, 1997

वो लड़की बनी थी

सोते वक़्त उसके कानों में लोरियाँ नहीं पड़ीं,
उठते वक़्त माँ के प्यारे होठों ने उसे चूमा नहीं,
किताबों की ओर उसकी हसरत भरी निग़ाहें ही जा सकीं,
स्कूल जाते हुए संगी-साथियों के संग वो घूमा नहीं।

उठते ही कामों की लिस्ट उसके सामने पड़ी थी,
कोल्हू के बैल की तरह बिताया उसने दिन,
रात को टूटे हुए शरीर के साथ ज़रूरी नहीं था,
कि वह सोने की कोशिश करता तारे गिन-गिन।

बाल-सुलभ हर आकांक्षा मन में ही दब गई थी,
ज़िद करने का अधिकार उससे छिन गया था,
"बच्चे - मर्ज़ी के मालिक" की परिभाषा के विपरीत था वो
समय से पहले, ज़रूरत से ज़्यादा दायित्व मिल गया था।

मैंने आख़िर किसी से पूछ ही डाला,
"नौकरों-सा क्यों है उस घर से उसका नाता?"
जवाब मिला,"कैकेयी की परंपरा निभाती हुई
उसके घर में है सौतेली माता।"

XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX

बड़ी-बड़ी आँसू भरी वो आँखें
उसकी व्यथा आप ही कह रहीं थी,
रात को झिड़कियाँ सुनकर सोई थी वो
सुबह उठकर फिर से बातें सह रही थी।

भाई का बस्ता सजाते हुए पेन खोला,
तो हाथ काँपे मानो चोरी कर रही हो।
हर हसरत की तरह इसे भी दबा लिया
लगा ऐसा जीते-जी वो मर रही हो।

देखने में बच्ची लगने वाली वो,
समय के पहले ही बड़ी हो गई थी,
उपेक्षा का विषपान करता देख उसे लगता था
मानो सर पर बोझ बन वो खड़ी हो गई थी।

जवाब माँगा मैंने उसके समाज से,
"क्यों?" उसकी तो माँ सौतेली नहीं थी।
सीधा-सपाट उत्तर मेरे कानों में पड़ा,
"विधाता के हाथों वो लड़की बनी थी।"

Tuesday, May 06, 1997

गुलाम कौन था?

सृष्टि के आरंभ से अब तक
गुनगुनाता है ये इतिहास,
युद्धों की श्रृंखला के गीत
जिसमें नहीं होता मेरा अहसास।

मैंने भी जलाया है अपना शरीर
इन युद्धों की चिताओं पर।
लेकिन मेरा नाम कोई नहीं लिखता
सहानुभूति से इतिहास की गाथाओं पर।

क्योंकि मैं उन बर्बर शासकों का अदना सैनिक था
जिन्होंने सिन्धु-ह्वांगहो सभ्यताओं के नष्ट किया था।
क्योंकि मैं उस गोरी के टुकड़ों पर पलता था,
जिसने तुम्हारी संस्कृति को भ्रष्ट किया था।

क्योंकि मैं उस सिकंदर की सेना का अंग था,
जिसकी आकांक्षा के आड़े आ न सकी इंसानियत।
क्योंकि मैं हिटलर और मुसोलिनी का एक प्यादा था
जिनकी हर चाल में छिपी थी हैवानियत।

क्योंकि मैंने दूर किया था तुम्हें
तुम्हारे बीवी-बच्चों घर और परिवार से,
मदद की थी उन वहशी दरिंदों की नाता जोड़ने में
तुम मासूमों का दासों के बाज़ार से।

क्योंकि तुम्हारे मदमत्त शासकों के सैनिक के रूप में
मैंने बरसाई थी तुम पर गोलियाँ बदले में कुल्हाड़ियों के,
किसी के इशारे पर उतार फेंका था तुम्हें
फर्स्ट-क्लास के डब्बे से रेलगाड़ियों से।

लेकिन क्या विश्वास करोगे आज मेरी बात पर
काँपे थे हाथ मेरे गर्दनें तुम्हारी काटते हुए।
चीत्कार कर उठा था मेरा हृदय भी
मौत का या घृणित प्रसाद बाँटते हुए।

रो उठा था मेरे भीतर का इंसान,
किलकारी का रुदन में बदलना सब नहीं पाया था मैं।
वह आगजनी, नरसंहार और मुनाफ़े की हवस देख
विचलित हुए बिना रह नहीं पाया था मैं।

रोक लिया था मुझे मेरी आत्मा ने आगे बढ़ने से इस पथ पर,
लेकिन पीछे मुड़ा तो खड़ा था कोई सिकंदर।
आँखों में हैवानियत का खून उतारे
वो था कोई गोरी, गजनी, मुसोलिनी या हिटलर।

उसकी आँखों की गहराई में मुझे
नज़र आ गया था इस कोशिश पर अपने विनाश का दृश्य।
"जी हुज़ूर", "यस माई लार्ड" कहकर
मैं दुहराने पर मजबूर था अपने वो ही कृत्य।

तुम गुलाम थे तो विद्रोह किया अपनी मर्ज़ी से,
लेकिन मैंने तो अपने मन और इंसानियत को मार ही डाला था।
तुम्हारे बलिदान पर तो सहानुभूति के दो शब्द भी थे,
लेकिन मैं तो त्रिशंकु की तरह ही लटकने वाला था।

तुम गुलाम थे, मानता हूँ,
लेकिन तुमने विद्रोह तो किया।
और मैं "विजय" का सुख भोगते हुए
अपनी आत्मा की धिक्कार सुनता रहा।

आज यदि लोग तुम्हारा नाम नहीं भी जानते हैं,
तो भी श्रद्धा-सुमन चढ़ाते हैं अनजाने नाम पर ही।
पर मुझे अनजाने में ही याद करते हैं मूर्ख और बर्बर के रूप में
जो विजेता कहलाने के लिए मिट गया अपनी खोखली आन पर ही।

बताओ गुलाम कौन था?
तुम या मैं?

Friday, April 18, 1997

मेरी ज़रूरत

ज़िन्दग़ी के इस तमाशे में
जब तक ख़ुद भी कोई तमाशा बनकर
चलती हूँ, तब तक दोस्त की कमी
महसूस नहीं होती इस पथ पर।

लेकिन कभी जब बनकर मूकदर्शक
नज़र फेरती हूँ इन तमाशों पर,
मेरी अनुपस्थिति का कोई प्रभाव
नज़र नहीं आता है लोगों पर।

टीस उठती है दिल में
कि मेरी कोई नहीं पहचान।
मैं किसी की ज़रूरत नहीं हूँ
हर कोई मानो हो मुझसे अनजान।

इच्छा होती है उस वक़्त कि काश!
मैं भी होती किसी की ज़िन्दग़ी का हिस्सा,
किसी की ज़िन्दग़ी के हर पृष्ठ पर होता
उसका मुझसे जुड़ा कोई किस्सा।

हाँ, एक दोस्त की कामना है मुझे
जिसे भी हो मेरी ज़रूरत।
मेरी अनुपस्थिति पर अभाव का अहसास
हो उसकी ज़िन्दग़ी की एक हक़ीकत।

Thursday, April 10, 1997

मेरी पहचान, मेरी कविताएँ

जब ज़िन्दग़ी बेगानी लगती है
तो मुड़कर देखती हूँ अपनी कविताएँ।
मैं क्या थी क्या हो गई हूँ,
शायद कोई अता-पता मिल जाए।

बता देती हैं ये कि मैंने
क्या खोया है, क्या पाया है,
क्या भूली हूँ, क्या सीखा है,
क्या सोचकर क्या गुनगुनाया है।

मिल जाता है इनमें मुझे कि
मैंने क्या सोचा था, क्या देखा था कभी।
बदलाव मुझमें भी नज़र आ जाता है
सोचकर कि क्या नज़रिया है अभी।

मैं क्या सोचती हूँ, क्या देखती हूँ,
क्या मानती हूँ, क्या जानती हूँ,
क्या चाहती हूँ, क्या कहती हूँ,
क्या खोजती हूँ, क्या मानती हूँ?

अब तक के इस सफ़र में मैंने
क्या खोया है, क्या पाया है?
सम्पूर्ण रूप में ऐसा कहो -
मेरा पूरा परिचय क्या है?

ढूँढ़ना चाहते हो तो ढूँढ़ो
शायद इन्हीं में मिल जाए,
क्योंकि मैं तो मेरी कविताएँ ही हूँ,
और मेरी पहचान, मेरी कविताएँ।