Sunday, October 15, 2006

मैं ही तो बेराह नहीं?

सब आ जाते रास्ते पर मैं ही तो बेराह नहीं?
सबके दिन फिरते रब तक जाती मेरी आह नहीं।

छिन जाता है ये भी, वो भी, हँस कर पर देखा करती मैं
बहाने की दो आँसू भी क्यों रह गई मुझको चाह नहीं।

गीत सुना जाते शायर सब, पंछी भी कुछ गा जाते हैं,
दर्द कौन सा है अंदर कि कहती मुँह से वाह नहीं।

इम्तिहान ये ज़िन्दग़ी के इतने लंबे क्यों होते हैं
कहना पड़ जाता है खुलकर - और अब अल्लाह नहीं।

Sunday, October 01, 2006

देखने में रास्ता छूट गए हैं सब नज़ारे

देखने में रास्ता छूट गए हैं सब नज़ारे,
मिल गई मंज़िल मग़र कब मिलेंगे अब नज़ारे।

नहीं थी देनी फुर्सत गर देख पाने की हमें,
रास्तों के बगल मे क्यों दिए थे रब नज़ारे?

पहुँच कर भी मंज़िल पर हारे हुए से हम रहे,
पीछे खड़ा खड़ा ही पर देख रहा है जग नज़ारे।

मंज़िल यों बेज़ार है कि ख़याल ये भी आता है
सच है मंज़िल या कहो फिर सच कहीं थे बस नज़ारे।

Sunday, August 27, 2006

Dedicated to Bangalore life!

तरस गई हूँ मैं
पथरा गई आँखें।
देख चुकी रास्ता
कई बार जा के।

पूछा पड़ोसियों से
उसे देखा है कहीं।
पागल समझते हैं
मुझे लोग सभी।

बहुत मन्नतें माँगी
बहुत रोई, गिड़गिड़ाई।
कितने संदेशे भेजे पर
काम वाली आज फिर नहीं आई।

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जाओ बढ़ो,
बिना हॉर्न बजाए,
मुझे बाईं ओर से
एक इंच की भी दूरी दिए बिना
ओवरटेक करो
चलाओ अपनी गाड़ी
साँप की तरह रेंगते हुए
करो आगे उसे
इधर से, उधर से
जान आफ़त में डालते हुए।
क्या होगा अगर आगे मुझसे निकल भी गए तो?
अगले जाम में
या अगले सिगनल पर
हमें फिर मिलना है।
फिर एक ही जगह से
सब शुरु करना है।

लेकिन फिर भी
जाओ, बढ़ो।


Tuesday, August 22, 2006

कहाँ ढूँढ़ूँ मैं अपना जहाँ

कहाँ ढूँढ़ूँ मैं अपना जहाँ
अपनी ज़मीं और आसमां।

सपनों में अक्सर देखा है
फूल वो खिलता है कहाँ?

तारों से जो झरता है
किसने देखा है वो झरना?

उड़ पाऊँ जिनसे मैं खुलकर
पंख कहो रखे हैं कहाँ?


Friday, August 04, 2006

जो है मन में उनसे अब कविताएँ नहीं बनती

जो है मन में उनसे अब कविताएँ नहीं बनती।
डुबाए बिना जो भिगो जाएँ, धाराएँ नहीं बहती।

खुशियाँ बेरुखी सही, पर दर्द भी रसहीन है।
बंजर मिट्टी पर कभी लताएँ नहीं सजती।

हुनर नहीं कि बोल कर भी बात छिपा जाएँ
बेबाक नहीं हो सकते उससे बात नहीं बनती।

बनाते हैं वे ख़ुदा तुम्हें, अहसान नहीं करते
ख़ुदाओं से दुनिया कभी ख़ताएँ नहीं सहती।

Tuesday, April 04, 2006

अब वो मेरा जहाँ नहीं

अब वो मेरा जहाँ नहीं,
ज़मीं नहीं आसमाँ नहीं।

कुछ बदला हो ना बदला हो
मेरे लिए वो शमाँ नहीं।

हाँ बीता सारा जीवन पर
मन कहता है अब वहाँ नहीं।

चलना है चलना ही है
चलना पड़ता है कहाँ नहीं।

Friday, December 09, 2005

वो दिन

देखा हमें बेरुखी से कई चैनल बदलते हुए
ठंढी सांस ले कर उन्होंने कहा,
"रविवार की एक फिल्म के लिए मचलने वाले,
हाय, वो सीधे दिन गए कहाँ।"

उन्हें जब देखते थे उस फिल्म से अकेले चिपके
अपने दिन याद करते थे उनके बुजुर्ग भी
वो बड़ा सा रेडियो, जिसके चारो ओर
पूरे गाँव की भीड़ लगती थी।

और उस रेडियो को भी मिली थी गालियाँ
कि कहाँ पहले लोग यों चिपके रहते थे
क्या दिन थे वो जब शामों में
सब मिलकर बस बातें करते थे।


Saturday, October 08, 2005

घाव-खुशी

घाव किसी के भरते नहीं सहलाने से कभी
उन्हें तो ढँक कर छोड़ देना ही अच्छा है।
जाता नहीं दर्द दास्ताँ सुनाने से कभी
उससे तो बस मुँह मोड़ लेना ही अच्छा है।

मरहम बहुत ढूँढ़े सदा लोगों ने मग़र
सब अच्छा करने की कोशिश के मर्ज़ का
इलाज नहीं कोई, कोई हल भी नहीं है
झगड़ा ग़र हो कही फ़र्ज़ फ़र्ज़ का।

आते हैं लोग पूछने खुश कैसे रहा जाए
कैसे बताऊँ वो ज़हीनी चीज़ नहीं है
मूँद लो आँखें ग़र कोई चीज़ तड़पाए
खुशी वही है जहाँ कि रीत यही है।

Friday, October 07, 2005

बस कलम रह गई साथ

चला गया जो भी आया था, बस कलम रह गई साथ।
किसी और का वो साया था, धुंधली-सी रह गई याद।

गीत कभी गाए थे मैंने, भूल गई हूँ सुर और ताल
लफ़्ज़ नहीं छूटे मुझसे पर, देते रहे समय को मात।

भाषाएँ सब अलग-अलग, सीखीं और फिर भूल गई,
पर जब जो भी जाना उसमें कलम चलाते रहे हाथ।

छूट गए सब लोग पुराने, और नज़ारे जान से प्यारे
जब भी पर जो भी देखा, नज़्मों मे सब लिया बाँध।


Saturday, August 06, 2005

बचपन में बताया था किसी ने

बचपन में बताया था किसी ने
कि तारे उतने पास नहीं होते
जितने दिखते हैं।
नहीं समझी थी मैं तब,
अब समझती हूँ।

बचपन में बताया था किसी ने
कि सूरज बड़ा दिखता चाँद से
फिर भी वो ज़्यादा दूर है।
नहीं समझी थी मैं तब,
अब समझती हूँ।

बचपन में बताया था किसी ने
चलती गाड़ी पर कि पेड़ नहीं
हम भाग रहे हैं।
नहीं समझी थी तब
अब समझती हूँ।

कोई पास होकर भी दूर कैसे होता है
नज़दीक दिखती चीज़ें कितनी दूर होती हैं
और हम भाग रहे होते हैं चीज़ों से
पता भी नहीं चलता
मान बैठते हैं कि क़िस्मत बुरी है
और चीजें भाग रहीं हैं हमसे।

अब समझती हूँ।