अब वो मेरा जहाँ नहीं
अब वो मेरा जहाँ नहीं,
ज़मीं नहीं आसमाँ नहीं।
कुछ बदला हो ना बदला हो
मेरे लिए वो शमाँ नहीं।
हाँ बीता सारा जीवन पर
मन कहता है अब वहाँ नहीं।
चलना है चलना ही है
चलना पड़ता है कहाँ नहीं।
अब वो मेरा जहाँ नहीं,
ज़मीं नहीं आसमाँ नहीं।
कुछ बदला हो ना बदला हो
मेरे लिए वो शमाँ नहीं।
हाँ बीता सारा जीवन पर
मन कहता है अब वहाँ नहीं।
चलना है चलना ही है
चलना पड़ता है कहाँ नहीं।
Posted by Jaya at 4/04/2006 06:39:00 AM 2 comments
देखा हमें बेरुखी से कई चैनल बदलते हुए
ठंढी सांस ले कर उन्होंने कहा,
"रविवार की एक फिल्म के लिए मचलने वाले,
हाय, वो सीधे दिन गए कहाँ।"
उन्हें जब देखते थे उस फिल्म से अकेले चिपके
अपने दिन याद करते थे उनके बुजुर्ग भी
वो बड़ा सा रेडियो, जिसके चारो ओर
पूरे गाँव की भीड़ लगती थी।
और उस रेडियो को भी मिली थी गालियाँ
कि कहाँ पहले लोग यों चिपके रहते थे
क्या दिन थे वो जब शामों में
सब मिलकर बस बातें करते थे।
Posted by Jaya at 12/09/2005 05:38:00 AM 3 comments
घाव किसी के भरते नहीं सहलाने से कभी
उन्हें तो ढँक कर छोड़ देना ही अच्छा है।
जाता नहीं दर्द दास्ताँ सुनाने से कभी
उससे तो बस मुँह मोड़ लेना ही अच्छा है।
मरहम बहुत ढूँढ़े सदा लोगों ने मग़र
सब अच्छा करने की कोशिश के मर्ज़ का
इलाज नहीं कोई, कोई हल भी नहीं है
झगड़ा ग़र हो कही फ़र्ज़ फ़र्ज़ का।
आते हैं लोग पूछने खुश कैसे रहा जाए
कैसे बताऊँ वो ज़हीनी चीज़ नहीं है
मूँद लो आँखें ग़र कोई चीज़ तड़पाए
खुशी वही है जहाँ कि रीत यही है।
Posted by Jaya at 10/08/2005 06:36:00 AM 5 comments
चला गया जो भी आया था, बस कलम रह गई साथ।
किसी और का वो साया था, धुंधली-सी रह गई याद।
गीत कभी गाए थे मैंने, भूल गई हूँ सुर और ताल
लफ़्ज़ नहीं छूटे मुझसे पर, देते रहे समय को मात।
भाषाएँ सब अलग-अलग, सीखीं और फिर भूल गई,
पर जब जो भी जाना उसमें कलम चलाते रहे हाथ।
छूट गए सब लोग पुराने, और नज़ारे जान से प्यारे
जब भी पर जो भी देखा, नज़्मों मे सब लिया बाँध।
Posted by Jaya at 10/07/2005 06:35:00 AM 4 comments
बचपन में बताया था किसी ने
कि तारे उतने पास नहीं होते
जितने दिखते हैं।
नहीं समझी थी मैं तब,
अब समझती हूँ।
बचपन में बताया था किसी ने
कि सूरज बड़ा दिखता चाँद से
फिर भी वो ज़्यादा दूर है।
नहीं समझी थी मैं तब,
अब समझती हूँ।
बचपन में बताया था किसी ने
चलती गाड़ी पर कि पेड़ नहीं
हम भाग रहे हैं।
नहीं समझी थी तब
अब समझती हूँ।
कोई पास होकर भी दूर कैसे होता है
नज़दीक दिखती चीज़ें कितनी दूर होती हैं
और हम भाग रहे होते हैं चीज़ों से
पता भी नहीं चलता
मान बैठते हैं कि क़िस्मत बुरी है
और चीजें भाग रहीं हैं हमसे।
अब समझती हूँ।
Posted by Jaya at 8/06/2005 06:34:00 AM 4 comments
Posted by Jaya at 6/22/2005 06:33:00 AM 2 comments
राज कर सकती है मुझपर
बातें मेरी क्यों सहेगी?
अजूबा लगता हो लगने दो
अँधेरा होता है चिराग तले ही।
Posted by Jaya at 6/21/2005 06:33:00 AM 2 comments
कभी ज़िन्दग़ी को हाथ से फिसलते देखा है?
कोई वज़ह नहीं कि जी न सकें,
हाथ में रखा जाम पी न सकें।
मजबूत हाथों के होते भी,
फिसलन की वजह से
कभी प्याले को हाथ से गिरते देखा है?
कभी ज़िन्दग़ी को हाथ से फिसलते देखा है?
Posted by Jaya at 6/21/2005 06:32:00 AM 2 comments
पागलपन है पर पागलपन
से ही दुनिया चलती जैसे।
इंसानों के लिए इंसानियत
सौ बार देखो गिरती कैसे।
चिल्ल-पौं ये भाग दौड़,
इक दूजे पर गिरना-पड़ना।
गर्व से कहना,"हम हैं चलाते
इस दुनिया का जीना-मरना।"
सच ही है यह झूठ नहीं पर,
शायद इनसे अलग भी कुछ है।
सुख-दुख इनसे बनते, उनसे
अलग भी सुख है, अलग भी दुख है।
दुनिया चलती नहीं है उनसे
बल्कि बदली जाती है।
जो पालक विष्णु को नहीं,
संहारक शिव को लाती है।
फिर वो निर्माता को उत्साह
भरी आवाज़ लगाती है।
और मानवता को फिर सेएक
नयी राह पर लाती है।
शायद फिर से ही गिरने को,
शायद फिर से उलझ पड़ने को।
शायद फिर सेचलाने को
दुनिया और लड़ने मरने को।
Posted by Jaya at 5/14/2005 06:31:00 AM 1 comments
सदियों से मनाते आए हो
तुम यहाँ मोहब्बत का जश्न,
पर कोई तुममे से सुन ना सका
एक ख़ामोश मूक सा प्रश्न।
उपेक्षित कुछ पल इतिहास के
जो तुम्हारे सामने रखते हैं।
पर जिनकी कमज़ोर आवाज़ को
तुम्हारे कान नहीं सुन सकते हैं।
मैं मुमताज महल हूँ - हाँ वही
जिससे हर प्रेमिका दुनिया की,
ईर्ष्या रखती होगी सोचकर
ऐसी मिलें हमें खुशियाँ भी।
कहानी मेरी सुनो आज
आज सच मेरा भी जानो
कान दे दो एक बार तो
पीछे फिर मानो ना मानो।
हरम खड़ा था - दूर होकर
चहल-पहल से इस दुनिया की।
उसमें बंद हज़ारों जैसी
मैं भी थी बस एक चिड़िया सी।
बादशाह की प्यारी थी तो
ज़्यादा रातें, कुछ ज़्यादा पल।
थोड़े ज़्यादा नौकर और फिर
मरने पर यह ताजमहल।
कर दूँ मैं क़ुर्बान सैकड़ों
आलीशान महल सब ऐसे।
प्यार अगर ऐसा मिल जाए
हों जिसमें हम एक-दूजे के।
बहुत बड़े का बड़ा-सा हिस्सा
संतोष नहीं वो दे पाता है।
छोटे से का पूर्ण अधिकार
खुशियाँ जैसी दे जाता है।
जश्न मनाओ मत पत्थर के
ताजमहल पर प्यार का तुम।
हाथों में ले हाथ कुटी में
स्वागत करो बहार का तुम।
सच्चा ताजमहल वो होगा
दे दिल जिसको बनायेंगे।
वो भी उस दिन जिस दिन दोनों
मिलकर एक हो जाएँगे।
नहीं बनाते हैं कारीगर
प्यार का कभी निशानियाँ।
बस लिख सकते वो बादशाहों
की बिगड़ी हुई कहानियाँ।
Posted by Jaya at 5/13/2005 06:30:00 AM 3 comments