Tuesday, April 04, 2006

अब वो मेरा जहाँ नहीं

अब वो मेरा जहाँ नहीं,
ज़मीं नहीं आसमाँ नहीं।

कुछ बदला हो ना बदला हो
मेरे लिए वो शमाँ नहीं।

हाँ बीता सारा जीवन पर
मन कहता है अब वहाँ नहीं।

चलना है चलना ही है
चलना पड़ता है कहाँ नहीं।

Friday, December 09, 2005

वो दिन

देखा हमें बेरुखी से कई चैनल बदलते हुए
ठंढी सांस ले कर उन्होंने कहा,
"रविवार की एक फिल्म के लिए मचलने वाले,
हाय, वो सीधे दिन गए कहाँ।"

उन्हें जब देखते थे उस फिल्म से अकेले चिपके
अपने दिन याद करते थे उनके बुजुर्ग भी
वो बड़ा सा रेडियो, जिसके चारो ओर
पूरे गाँव की भीड़ लगती थी।

और उस रेडियो को भी मिली थी गालियाँ
कि कहाँ पहले लोग यों चिपके रहते थे
क्या दिन थे वो जब शामों में
सब मिलकर बस बातें करते थे।


Saturday, October 08, 2005

घाव-खुशी

घाव किसी के भरते नहीं सहलाने से कभी
उन्हें तो ढँक कर छोड़ देना ही अच्छा है।
जाता नहीं दर्द दास्ताँ सुनाने से कभी
उससे तो बस मुँह मोड़ लेना ही अच्छा है।

मरहम बहुत ढूँढ़े सदा लोगों ने मग़र
सब अच्छा करने की कोशिश के मर्ज़ का
इलाज नहीं कोई, कोई हल भी नहीं है
झगड़ा ग़र हो कही फ़र्ज़ फ़र्ज़ का।

आते हैं लोग पूछने खुश कैसे रहा जाए
कैसे बताऊँ वो ज़हीनी चीज़ नहीं है
मूँद लो आँखें ग़र कोई चीज़ तड़पाए
खुशी वही है जहाँ कि रीत यही है।

Friday, October 07, 2005

बस कलम रह गई साथ

चला गया जो भी आया था, बस कलम रह गई साथ।
किसी और का वो साया था, धुंधली-सी रह गई याद।

गीत कभी गाए थे मैंने, भूल गई हूँ सुर और ताल
लफ़्ज़ नहीं छूटे मुझसे पर, देते रहे समय को मात।

भाषाएँ सब अलग-अलग, सीखीं और फिर भूल गई,
पर जब जो भी जाना उसमें कलम चलाते रहे हाथ।

छूट गए सब लोग पुराने, और नज़ारे जान से प्यारे
जब भी पर जो भी देखा, नज़्मों मे सब लिया बाँध।


Saturday, August 06, 2005

बचपन में बताया था किसी ने

बचपन में बताया था किसी ने
कि तारे उतने पास नहीं होते
जितने दिखते हैं।
नहीं समझी थी मैं तब,
अब समझती हूँ।

बचपन में बताया था किसी ने
कि सूरज बड़ा दिखता चाँद से
फिर भी वो ज़्यादा दूर है।
नहीं समझी थी मैं तब,
अब समझती हूँ।

बचपन में बताया था किसी ने
चलती गाड़ी पर कि पेड़ नहीं
हम भाग रहे हैं।
नहीं समझी थी तब
अब समझती हूँ।

कोई पास होकर भी दूर कैसे होता है
नज़दीक दिखती चीज़ें कितनी दूर होती हैं
और हम भाग रहे होते हैं चीज़ों से
पता भी नहीं चलता
मान बैठते हैं कि क़िस्मत बुरी है
और चीजें भाग रहीं हैं हमसे।

अब समझती हूँ।

Wednesday, June 22, 2005

घर

तिनके जोड़ लोगो को
घर बनाते देखा है।
बाढ़ में बहते हुए
घर को बचाते देखा है।
गिरते हुए घर को
मजबूत कराते देखा है।
शायद कभी गुस्से में
घर को जलाते देखा है।

पर कभी गिराने के लिए
अपने ही हाथों से, किसी को
घर सजाते देखा है?

Tuesday, June 21, 2005

No Title

किसी और को सौंप दूँ तो क्या
क़िस्मत तो वो मेरी ही रहेगी।

जो लिख गई लिखने वाले के हाथों
कहानी तो वो वही कहेगी।
आँखें मूँद भी लूँ मैं तो क्या
बंद पलकों से ही बहेगी।

राज कर सकती है मुझपर
बातें मेरी क्यों सहेगी?

अजूबा लगता हो लगने दो
अँधेरा होता है चिराग तले ही।

कभी ज़िन्दग़ी को हाथ से फिसलते देखा है?

कभी ज़िन्दग़ी को हाथ से फिसलते देखा है?

कोई वज़ह नहीं कि जी न सकें,
हाथ में रखा जाम पी न सकें।
मजबूत हाथों के होते भी,
फिसलन की वजह से
कभी प्याले को हाथ से गिरते देखा है?

कभी ज़िन्दग़ी को हाथ से फिसलते देखा है?

Saturday, May 14, 2005

चलना और बदलना

पागलपन है पर पागलपन
से ही दुनिया चलती जैसे।
इंसानों के लिए इंसानियत
सौ बार देखो गिरती कैसे।

चिल्ल-पौं ये भाग दौड़,
इक दूजे पर गिरना-पड़ना।
गर्व से कहना,"हम हैं चलाते
इस दुनिया का जीना-मरना।"

सच ही है यह झूठ नहीं पर,
शायद इनसे अलग भी कुछ है।
सुख-दुख इनसे बनते, उनसे
अलग भी सुख है, अलग भी दुख है।

दुनिया चलती नहीं है उनसे
बल्कि बदली जाती है।
जो पालक विष्णु को नहीं,
संहारक शिव को लाती है।

फिर वो निर्माता को उत्साह
भरी आवाज़ लगाती है।
और मानवता को फिर सेएक
नयी राह पर लाती है।

शायद फिर से ही गिरने को,
शायद फिर से उलझ पड़ने को।
शायद फिर सेचलाने को
दुनिया और लड़ने मरने को।

Friday, May 13, 2005

ताजमहल

सदियों से मनाते आए हो
तुम यहाँ मोहब्बत का जश्न,
पर कोई तुममे से सुन ना सका
एक ख़ामोश मूक सा प्रश्न।

उपेक्षित कुछ पल इतिहास के
जो तुम्हारे सामने रखते हैं।
पर जिनकी कमज़ोर आवाज़ को
तुम्हारे कान नहीं सुन सकते हैं।

मैं मुमताज महल हूँ - हाँ वही
जिससे हर प्रेमिका दुनिया की,
ईर्ष्या रखती होगी सोचकर
ऐसी मिलें हमें खुशियाँ भी।

कहानी मेरी सुनो आज
आज सच मेरा भी जानो
कान दे दो एक बार तो
पीछे फिर मानो ना मानो।

हरम खड़ा था - दूर होकर
चहल-पहल से इस दुनिया की।
उसमें बंद हज़ारों जैसी
मैं भी थी बस एक चिड़िया सी।

बादशाह की प्यारी थी तो
ज़्यादा रातें, कुछ ज़्यादा पल।
थोड़े ज़्यादा नौकर और फिर
मरने पर यह ताजमहल।

कर दूँ मैं क़ुर्बान सैकड़ों
आलीशान महल सब ऐसे।
प्यार अगर ऐसा मिल जाए
हों जिसमें हम एक-दूजे के।

बहुत बड़े का बड़ा-सा हिस्सा
संतोष नहीं वो दे पाता है।
छोटे से का पूर्ण अधिकार
खुशियाँ जैसी दे जाता है।

जश्न मनाओ मत पत्थर के
ताजमहल पर प्यार का तुम।
हाथों में ले हाथ कुटी में
स्वागत करो बहार का तुम।

सच्चा ताजमहल वो होगा
दे दिल जिसको बनायेंगे।
वो भी उस दिन जिस दिन दोनों
मिलकर एक हो जाएँगे।

नहीं बनाते हैं कारीगर
प्यार का कभी निशानियाँ।
बस लिख सकते वो बादशाहों
की बिगड़ी हुई कहानियाँ।