विश्वास
कई लम्हे खुशियों के
कई पल सुख के
कई मुस्कानें रख दीं
तुमने मेरे मुख पे ।
कभी तुम्हारी प्रीत ने
दिल तोड़ा नहीं आस का ।
पर सच कहूँ? इन सबसे
बड़ा था वो एक पल विश्वास का!
कई लम्हे खुशियों के
कई पल सुख के
कई मुस्कानें रख दीं
तुमने मेरे मुख पे ।
कभी तुम्हारी प्रीत ने
दिल तोड़ा नहीं आस का ।
पर सच कहूँ? इन सबसे
बड़ा था वो एक पल विश्वास का!
Posted by Jaya at 1/23/2005 05:18:00 AM 0 comments
चुप रहना ही पड़ता है।
दिल में छिपकर, हर दिन हर पल,
जो बात मुझे अंदर से खाती है,
सामने आकर बोलना चाहूँ उससे पहले
ही तुम्हें समझ में आ जाती है।
कहने को क्या बचता है?
चुप रहना ही पड़ता है।
रातों को अक्सर सपने आते हैं,
जिनमें कोई हँसता रोता है।
सुबह उठकर पता चलता है
तुमने भी वही देखा होता है।
अलग तुमसे क्या रहता है?
चुप रहना ही पड़ता है।
जो गीत मेरे दिल में रहता है,
अचानक वही गुनगुनाते हो।
जो बात मेरे मन में आती है,
जाने कब तुम ही कह वो जाते हो।
आश्चर्य मुझे तो लगता है,
पर चुप रहना ही पड़ता है।
शिकायतें नहीं कर रही मैं
मन ही मन में मुसकाती हूँ।
सच हो सकता है यह सब
सोच कर हैरान तो मैं हो जाती हूँ।
शायद तुम्हें भी कुछ ऐसा ही लगता है,
कि बहुत कुछ होने पर भी
चुप रहना ही पड़ता है।
Posted by Jaya at 1/20/2005 04:50:00 AM 0 comments
आओ साथी, हम चल कर ये दुनिया देखें।
देख रहे हो पर्वत की उत्तुंग शिखाएँ?
मानव-पथ में लाया ये कितनी बाधाएँ!
पर अपनी ऊँचाई से प्रेरित करता रहा हमेशा,
आओ पैरॊं के निशान हम उसपर अपने भी रख दें।
आओ साथी, हम चल कर ये दुनिया देखें।
देख रहे हो पहाड़ों पर रहने वाले मानव भोले?
ऊँची-नीची थकाने वाली राहों पर हैं बैठे खोले,
राज़ अनेकों नए पुराने, प्रकृति ने जो दिए हमें हैं,
आओ इन संग बैठ क्षण भर हिमकणों से हम भी खेलें।
आओ साथी, हम चल कर ये दुनिया देखें।
खा नहीं सकते ये हम-तुम, देखो व्यंजन ये अजीबोग़रीब,
क्षणभर में ही ले आया ये, विभिन्नताओं को कितना क़रीब।
कुछ देना चाहते हैं ये, महत्व जिसका हमारी जीवन-शैली में नहीं,
आओ फिर भी भेंट इनसे प्यार भरी ये हम-तुम ले लें।
आओ साथी, हम चल कर ये दुनिया देखें।
कोशिश कर लो कितनी ही, भाषा ये समझ नहीं आती,
पर कोई सूत्र तो है, बात हमारी मानव बुद्धि समझ ही जाती।
कहना-सुनना इनसे कुछ है, भाषाएँ दीवार नहीं बनेंगी,
आओ परे भाषा के जाकर इनकी भी कुछ याद सँजो लें।
आओ साथी, हम चल कर ये दुनिया देखें।
दूर-दूर तक देखो कैसे, सागर यहाँ लहरा रहा,
लहरें निमंत्रण इसकी देतीं, हमको पास बुला रहा,
रहस्य अनगिनत हैं इसके अंदर छिपे जाने कब से,
ये रेत ज़रा टटोलें आओ हम भी सीपी मोती ढूँढ़े।
आओ साथी, हम चल कर ये दुनिया देखें।
पक्षी इतने दूर-दूर से क्यों यहाँ उड़ आते हैं?
अपनी भाषा में गाते क्यों, जाने, हमको लुभाते हैं।
अलग-सी दुनिया होगी उनकी, पर आनन्द वहाँ भी है,
आओ क्षण भर इनकी गुनगुन में हम भी खो लें।
आओ साथी, हम चल कर ये दुनिया देखें।
वीरान बने ये खंडहर कभी आलीशान रहे होंगे,
कोई मुस्कान खिली होगी, कुछ क्रूर ठहाके लगे होंगे,
उस समय यदि हम आते तो ये पहुँच से हमारे बाहर होते,
बीते समय का लाभ उठाकर आओ इनकी कथा टटोलें।
आओ साथी, हम चल कर ये दुनिया देखें।
ये कटे वृक्ष, ये बीमार से चेहरे, कुछ इनका भी संदेश है,
कैसे चकित हुऎ बैठे हैं अलग सा जॊ हमारा वेश है,
किस्मत ने यदि कृपा की है तॊ क्या हम कुछ कर सकते नहीं?
कुछ और नहीं तॊ थॊड़ी देर हम इनके भी सुख-दुख झेलें।
आओ साथी, हम चल कर ये दुनिया देखें।
कितनी व्यथा, कितने आँसू, इन सबकी कोई कहानी है,
सुख-दुख तो यहाँ रहते ही हैं, ये दुनिया आनी-जानी है।
इस चक्र से निकल नहीं सकते हम, पर जी तो उसको सकते हैं,
इस दुनिया के हर कोने से हम थोड़े से सुख-दुख ले लें।
आओ साथी, हम चल कर ये दुनिया देखें।
यों तो हम दुनिया अपनी एक-दूजे तक सीमित कर सकते हैं,
पर बनेंगे छोटे से महल जो, कभी भी वे ढह सकते हैं,
बना सके दुनिया विशाल तो जीवन कभी सूना न होगा ।
इतना विशाल है विश्व सामने, क्यों न प्रेम को शरण हम दे दें।
आओ साथी, हम चल कर ये दुनिया देखें।
Posted by Jaya at 1/19/2005 04:35:00 AM 0 comments
मज़बूरियाँ हैं जो बाँधे हैं,
वादे हैं जो मुझे निभाने हैं,
साथ नहीं दे पाऊँगी तुम्हारा
इसके लिए माफ़ तो कर पाओगे ना?
राहें बंद हुईं तुम्हारी अगर मेरी वज़ह से
ग्लानि से भर जाऊँगी मैं ज़िंदा रह के ।
जब भी कोई नया रास्ता दिखाएगी ज़िन्दग़ी
उस पर तुम आगे तो बढ़ जाओगे ना?
और जब मुझे ऐसी ज़रूरत पड़ेगी,
कि तुम्हारी यादें ही सहारा बन सकेंगी,
उस वक्त़ मेरे सपनों में तुम
ख़ुद आगे बढ़कर आओगे ना?
काँटें बन जायेंगी जब राहों में मेरी यादें
चुभने लगें हृदय में कुछ अनकहे वादे,
उस समय अपनी और औरों की ख़ातिर
तुम मुझे भूल तो पाओगे ना?
और जब कभी छूट रही होंगी मेरी साँसें अन्तिम,
कसक और बेबसी का अहसास बढ़ता होगा हर दिन,
उस दिन एक बार फिर सहारा देने को
कुछ पल के लिए ही, मुझसे मिलने आओगे ना?
Posted by Jaya at 1/19/2005 04:22:00 AM 0 comments
मैं ख़ुद को सँभालने की कोशिश करती हूँ,
पर इस असंभव बहाव में लिए कहाँ पर जाती है मुझे?
कैसी भूलभुलैया है जहाँ एक साथ ही असीम आनंद
और डरावनी शंकाओं का अहसास करवाती है मुझे ?
ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।
Posted by Jaya at 1/12/2005 04:16:00 AM 0 comments
मैं तुझे शब्दों में ढालने की कोशिश करती हूँ,
पर ख़ुद की असमर्थता पर तू क्षोभ से भर जाती है मुझे ।
और कभी अनकही बातॊं का अर्थ गुनगुना मेरे कानॊं में
बिना वज़ह आई मुस्कान से भर जाती है मुझे ।
ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।
ठीक है तू चुप ही रह, मैं भी चुप ही बैठती हूँ;
चुप्पी में ही तू मानो सितारों से जड़ जाती है मुझे ।
पहली बार ही समझाया तूने महत्व शब्दों की असमर्थता का,
ओह! कैसे तू अक्सर एक नए अहसास से भर जाती है मुझे ।
ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।
Posted by Jaya at 1/10/2005 04:16:00 AM 0 comments
जब भी लगता है, चीज़ें और बुरी नहीं हॊ सकतीं,
तू दे एक और बुरी ख़बर जाती है मुझे ।
और आँख-मिचौली खेलती हुई, अपनी करतूतॊं से
हर नए दिन थॊड़ा ज्यादा हैरान कर जाती है मुझे ।
ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।
मैं भागती हूँ तेरे पीछे, तुझे समझने कॊ,
पर बहरूपियॆ-सी तू हमेशा छल जाती है मुझे ।
मैं तुझे अपनी तरह देखने की कॊशिश करती हूँ,
पर छलिनी, तू उलटा बदल जाती है मुझे ।
ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।
जब कॊसती हूँ तुझे, तेरी शैतानियॊं कॊ,
तॊ एक अलग से ही रूप में नज़र आती है मुझे ।
उनींदी आँखें मेरी खुल पायें उससे पहले ही,
तकिए के किनारे रखी तेरी कॊई प्यारी चीज़ मिल जाती है मुझे ।
ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।
तेरे बारे में मेरे मेरे क्षण-क्षण बदलते विचार से,
अपनी अस्थिरता पर खुद ही शर्म आती है मुझे ।
तुझे छॊड़ती भी नहीं मैं क्या करूँ, जैसी भी है,
जॊ भी है, तू हमेशा ही पर भाती है मुझे ।
ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।
Posted by Jaya at 1/07/2005 04:15:00 AM 1 comments
नहीं, तुम दूर ही अच्छे ।
दूर जो हो तुम आँखों से
तो मन के एक निष्कलुष संसार में
तुम्हें बसा रखा है मैंने
हृदय के स्वच्छंद विहार में ।
पास आ गए तो रोज़ की हज़ारों
चिंताओं के बीच तुम्हें पाऊँगी कैसे ?
नहीं, तुम दूर ही अच्छे ।
तुम नातों से अलग हो
रिश्तों से परे हो,
मेरे हृदय में एक प्रकाश-पुंज
या रत्न से जड़े हो ।
पास आ गए तो एक ओर तुम्हें रख
दूजी ओर कैसे निभाऊँगी रिश्ते?
नहीं, तुम दूर ही अच्छे ।
जी मचल जाता है तुम्हें याद करते ही,
सिहर जाती हूँ ख्यालों में ही तुम्हें महसूस कर ।
स्वप्नों में भी तो सताते रहते हो,
बहरूपिये सा कोई रूप धर ।
पास आ गए तो इस हृदय की
धड़कन तेज होने से बचाऊँगी कैसे?
नहीं, तुम दूर ही अच्छे ।
तुम स्वप्न-से सुंदर हो,
कल्पनाओं-से मोहक हो,
क्लेश भरे मेरे जग से दूर
धैर्य व शांति के द्योतक हो ।
पास आ गए तो विश्वास नहीं कर पाऊँगी
कि इस जग के हो, फिर भी हो इतने सच्चे ।
नहीं, तुम दूर ही अच्छे ।
Posted by Jaya at 1/02/2005 04:14:00 AM 0 comments
कुछ पीछे छोड़ तो आई हूँ ।
कुछ पिछड़े हुए क़ायदे थे,
कुछ बेवकूफ़ी भरे वादे थे ।
उन्हें छोड़ा ठीक, पर एक सरलता भी थी
उससे भी नाता तोड़ तो आई हूँ ।
कुछ पीछे छोड़ तो आई हूँ ।
आँसू व्यर्थ में निकलते थे,
लोग बेकार ही चिन्ता करते थे,
पर उनके पीछे अपनापन भी था,
अब मैं नहीं जोड़ जो पाई हूँ ।
कुछ पीछे छोड़ तो आई हूँ ।
सर हमेशा झुकाना पड़ता था,
आवाज़ को क़ाबू मॆं लाना पड़ता था,
पर लड़खड़ाने पर किसी का हाथ तो बढ़ता था,
उससे भी मुँह मोड़ तो आई हूँ ।
कुछ पीछे छोड़ तो आई हूँ ।
Posted by Jaya at 12/25/2004 04:13:00 AM 1 comments
कल रात हवा बहुत सर्द थी।
बैठी थी मैं अकेली डूबी अपनी सोच में,
कोई उपाय हो कि बीतते समय को हम रोक लें।
कि सभी सिहरा गई मुझे अनजान दिशा से आती हवा,
मानो सुना रही वो किसी का दर्द थी।
गुज़रते हुए वो मेरे कानों में कह गई,
"नहीं लगता तुझे, तू अपने बारे में ज़्यादा ही सोच रही?"
धिक्कार की नज़रों से देखा उसने मुझे,
याद दिलाने वो आई मुझे कोई कर्ज थी।
कल रात हवा बहुत सर्द थी।
सिहरन होने पर लपेटने की कोशिश की मैंने चादर,
पर हवा तेज हो गई, उड़ा ले गई उसे बाहर,
"चादर ओढ़ कर ठिठुरने वालों को भूलना चाहती है?
भूल गई वो दिन जब तुझे उनसे ही गर्ज थी?"
कल रात हवा बहुत सर्द थी।
"समय को रोककर तू उन्हें ख़ुद से दूर रखना चाहती है?
अपनी ही आत्मा को धोखा देकर निर्दोष बनना चाहती है?"
आखिर क्या चाहती थी वो मुझसे?
क्या वो बताने आई मेरा फ़र्ज़ थी?
कल रात हवा बहुत सर्द थी।
कुछ सोती हुई सच्चाइयों को जगा दिया उसने
खुद को खुद से ही डर सा लगा दिया उसने,
खुशियाँ आज की सच में स्वर्ग हैं?
या वो राहें बना रही है नर्क की?
कल रात हवा बहुत सर्द थी।
Posted by Jaya at 12/04/2004 04:11:00 AM 0 comments