Wednesday, January 12, 2005

ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे (3)

मैं ख़ुद को सँभालने की कोशिश करती हूँ,
पर इस असंभव बहाव में लिए कहाँ पर जाती है मुझे?
कैसी भूलभुलैया है जहाँ एक साथ ही असीम आनंद
और डरावनी शंकाओं का अहसास करवाती है मुझे ?

ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।

Monday, January 10, 2005

ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे (2)

मैं तुझे शब्दों में ढालने की कोशिश करती हूँ,
पर ख़ुद की असमर्थता पर तू क्षोभ से भर जाती है मुझे ।
और कभी अनकही बातॊं का अर्थ गुनगुना मेरे कानॊं में
बिना वज़ह आई मुस्कान से भर जाती है मुझे ।

ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।

ठीक है तू चुप ही रह, मैं भी चुप ही बैठती हूँ;
चुप्पी में ही तू मानो सितारों से जड़ जाती है मुझे ।
पहली बार ही समझाया तूने महत्व शब्दों की असमर्थता का,
ओह! कैसे तू अक्सर एक नए अहसास से भर जाती है मुझे ।

ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।

Friday, January 07, 2005

ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे (1)

जब भी लगता है, चीज़ें और बुरी नहीं हॊ सकतीं,
तू दे एक और बुरी ख़बर जाती है मुझे ।
और आँख-मिचौली खेलती हुई, अपनी करतूतॊं से
हर नए दिन थॊड़ा ज्यादा हैरान कर जाती है मुझे ।

ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।

मैं भागती हूँ तेरे पीछे, तुझे समझने कॊ,
पर बहरूपियॆ-सी तू हमेशा छल जाती है मुझे ।
मैं तुझे अपनी तरह देखने की कॊशिश करती हूँ,
पर छलिनी, तू उलटा बदल जाती है मुझे ।

ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।

जब कॊसती हूँ तुझे, तेरी शैतानियॊं कॊ,
तॊ एक अलग से ही रूप में नज़र आती है मुझे ।
उनींदी आँखें मेरी खुल पायें उससे पहले ही,
तकिए के किनारे रखी तेरी कॊई प्यारी चीज़ मिल जाती है मुझे ।

ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।

तेरे बारे में मेरे मेरे क्षण-क्षण बदलते विचार से,
अपनी अस्थिरता पर खुद ही शर्म आती है मुझे ।
तुझे छॊड़ती भी नहीं मैं क्या करूँ, जैसी भी है,
जॊ भी है, तू हमेशा ही पर भाती है मुझे ।

ज़िन्दग़ी, तू बड़ा तड़पाती है मुझे ।

Sunday, January 02, 2005

नहीं, तुम दूर ही अच्छे

नहीं, तुम दूर ही अच्छे ।

दूर जो हो तुम आँखों से
तो मन के एक निष्कलुष संसार में
तुम्हें बसा रखा है मैंने
हृदय के स्वच्छंद विहार में ।

पास आ गए तो रोज़ की हज़ारों
चिंताओं के बीच तुम्हें पाऊँगी कैसे ?

नहीं, तुम दूर ही अच्छे ।

तुम नातों से अलग हो
रिश्तों से परे हो,
मेरे हृदय में एक प्रकाश-पुंज
या रत्न से जड़े हो ।

पास आ गए तो एक ओर तुम्हें रख
दूजी ओर कैसे निभाऊँगी रिश्ते?

नहीं, तुम दूर ही अच्छे ।

जी मचल जाता है तुम्हें याद करते ही,
सिहर जाती हूँ ख्यालों में ही तुम्हें महसूस कर ।
स्वप्नों में भी तो सताते रहते हो,
बहरूपिये सा कोई रूप धर ।

पास आ गए तो इस हृदय की
धड़कन तेज होने से बचाऊँगी कैसे?

नहीं, तुम दूर ही अच्छे ।

तुम स्वप्न-से सुंदर हो,
कल्पनाओं-से मोहक हो,
क्लेश भरे मेरे जग से दूर
धैर्य व शांति के द्योतक हो ।

पास आ गए तो विश्वास नहीं कर पाऊँगी
कि इस जग के हो, फिर भी हो इतने सच्चे ।

नहीं, तुम दूर ही अच्छे ।

Saturday, December 25, 2004

कुछ पीछे छोड़ तो आई हूँ ।

कुछ पीछे छोड़ तो आई हूँ ।

कुछ पिछड़े हुए क़ायदे थे,
कुछ बेवकूफ़ी भरे वादे थे ।
उन्हें छोड़ा ठीक, पर एक सरलता भी थी
उससे भी नाता तोड़ तो आई हूँ ।

कुछ पीछे छोड़ तो आई हूँ ।

आँसू व्यर्थ में निकलते थे,
लोग बेकार ही चिन्ता करते थे,
पर उनके पीछे अपनापन भी था,
अब मैं नहीं जोड़ जो पाई हूँ ।

कुछ पीछे छोड़ तो आई हूँ ।

सर हमेशा झुकाना पड़ता था,
आवाज़ को क़ाबू मॆं लाना पड़ता था,
पर लड़खड़ाने पर किसी का हाथ तो बढ़ता था,
उससे भी मुँह मोड़ तो आई हूँ ।

कुछ पीछे छोड़ तो आई हूँ ।

Saturday, December 04, 2004

कल रात हवा बहुत सर्द थी

कल रात हवा बहुत सर्द थी।

बैठी थी मैं अकेली डूबी अपनी सोच में,
कोई उपाय हो कि बीतते समय को हम रोक लें।
कि सभी सिहरा गई मुझे अनजान दिशा से आती हवा,
मानो सुना रही वो किसी का दर्द थी।

कल रात हवा बहुत सर्द थी।

गुज़रते हुए वो मेरे कानों में कह गई,
"नहीं लगता तुझे, तू अपने बारे में ज़्यादा ही सोच रही?"
धिक्कार की नज़रों से देखा उसने मुझे,
याद दिलाने वो आई मुझे कोई कर्ज थी।

कल रात हवा बहुत सर्द थी।

सिहरन होने पर लपेटने की कोशिश की मैंने चादर,
पर हवा तेज हो गई, उड़ा ले गई उसे बाहर,
"चादर ओढ़ कर ठिठुरने वालों को भूलना चाहती है?
भूल गई वो दिन जब तुझे उनसे ही गर्ज थी?"

कल रात हवा बहुत सर्द थी।

"समय को रोककर तू उन्हें ख़ुद से दूर रखना चाहती है?
अपनी ही आत्मा को धोखा देकर निर्दोष बनना चाहती है?"
आखिर क्या चाहती थी वो मुझसे?
क्या वो बताने आई मेरा फ़र्ज़ थी?

कल रात हवा बहुत सर्द थी।

कुछ सोती हुई सच्चाइयों को जगा दिया उसने
खुद को खुद से ही डर सा लगा दिया उसने,
खुशियाँ आज की सच में स्वर्ग हैं?
या वो राहें बना रही है नर्क की?

कल रात हवा बहुत सर्द थी।

Sunday, November 14, 2004

उर्वशी के नाम

(इस कविता की प्रेरणा दिनकर की प्रसिद्ध रचना 'उर्वशी' पढ़ने से आई। दिनकर रचित 'उर्वशी' को जवाब देना, वह भी कविता के माध्यम से, दुस्साहस ही कहा जाएगा, किन्तु मनुष्य कभी-कभी दुस्साहस कर बैठता है। मैं भी अपवाद नहीं हूँ।)

गन्ध का कोई महत्व नहीं था
तेरे आकुल जीवन में,
पृथ्वी पर प्रतिबंध नहीं ये,
धारणा थी तेरे मन में।

सत्य है यह सिद्धांतों में,
पर हमें भी सुलभ नहीं है,
स्वर्गीय चीज़ है तू तुझे ये
धरती पर भले दुर्लभ नहीं है।

किसी समाज से बँधी नहीं तू,
पेट की चिन्ता न तुझे सताती,
स्वर्ग के रिश्ते तोड़ तभी तू
पृथ्वी पर आनंद मनाती।

अयोनिजा तू है, जन्म मे
तुझपर कोई बन्धन न डाला,
कुछ भी कर ले तू, कोई भी
व्यथित हो करने क्रंदन न वाला।

लोक-लोक में उड़ सकती तू
कोई बंध नहीं है,
तभी तो महत्वपूर्ण तेरे
जीवन में गंध नहीं है।

जन्म व कर्म के भारों के
बीच प्रेम हम हैं कर जाते,
टूक-टूक हो जाते प्राण,
सारे रिश्ते यों निभाते।

ओर अलग-अलग इन कर्तव्यों में
क्लेश जब अक्सर होता है,
असमर्थता जानकर अपनी
हृदय बहुत रोता है।

खुद की धिक्कार उस असमर्थता
पर जब सहन नहीं हो पाती है,
कोई उपाय ढूँढ़ने को हृदय की
धड़कन दौड़ लगाती है।

और समाधान उस वक़्त एक
ही आता है जीवन में,
गंधों से बहलाकर ख़ुद को
चैन आता है मन में।

अपनी व दूजों की तब हम
असमर्थता माफ़ करते हैं।
गन्ध को हृदय से गला प्रिय के
सुख की कामना करते हैं।

पर तू क्या समझेगी ये, कभी
ऐसी व्यथा दिल में सेवी है?
सच ही कहा था तूने -
तू मानवी नहीं देवी है।

ईर्ष्या कर मुझसे तो बड़ी बनेगी तू
और उज्ज्वल मेरा मान होगा,
मैं जल भी नहीं सकती तुझसे,
आहत मानव का स्वाभिमान होगा।

Thursday, November 11, 2004

प्रेरणा

क्योंकि वह स्वयं व्यक्त नहीं हो पाती है,
शायद इसलिए वह प्रेरणा बन जाती है।

वह जो स्वयं पीछे रहते हुए भी
किसी की कलम से निकला महाकाव्य बन जाती है,
दुनिया में अस्तित्वहीन हो भी
बड़ी-बड़ी चट्टानें पिघला पाती है।

क्योंकि वह स्वयं व्यक्त नहीं हो पाती है,
शायद इसलिए वह प्रेरणा बन जाती है।

वह जो सामने आए बिना भी
चित्रकार की तूलिका को गति दे जाती है,
जो खुद अदृश्य होकर भी
उस कृति में सजीव हो जाती है।

क्योंकि वह स्वयं व्यक्त नहीं हो पाती है,
शायद इसलिए वह प्रेरणा बन जाती है।

जो एक सरकटे के शरीर में
हज़ारों की शक्ति ले आती है,
जो एक अकेले के आगे
हज़ारों के झुका जाती है।

क्योंकि वह स्वयं व्यक्त नहीं हो पाती है,
शायद इसलिए वह प्रेरणा बन जाती है।

वह जिससे निद्रा-बोझिल आँखें भी
असीम ज्योति पा जाती हैं,
जो थकान से टूटे शरीर को भी
ऊर्जावान कर जाती है।

क्योंकि वह स्वयं व्यक्त नहीं हो पाती है,
शायद इसलिए वह प्रेरणा बन जाती है।

वह जो साधारण मानव में भी
कुछ करने का जुनून भर जाती है,
जो समर्थों से उनके छिपे हुए सामर्थ्य
का अहसास बयाँ कर जाती है।

क्योंकि वह स्वयं व्यक्त नहीं हो पाती है,
शायद इसलिए वह प्रेरणा बन जाती है।

जो ख़ुद कभी आगे न आई,
जिसकी सीधी गाथा न किसी ने गाई,
जो किसी के अंदर रह गई घुटकर,
पर एक रचयिता का बल उसमें गई भऱ।

जिससे निकली रचना देख
देह मेरी सिहर जाती है,
जिसके बारे में बिना जाने भी
मेरा काया उसे शीश नवाती है।

क्योंकि वह स्वयं व्यक्त नहीं हो पाती है,
शायद इसलिए वह प्रेरणा बन जाती है।

इतिहास

इतिहास बड़ी अजीब-सी चीज़ होता है।

जिसके लिए तुम अपना सर्वस्व गँवाते हो,
जिसके लिए लाखों का खून बहाते हो,
उसे एक मोटी सी किताब के
एक पन्ने या एक पंक्ति में समेट देता है।

इतिहास बड़ी अजीब-सी चीज़ होता है।

गुप्त पत्र दुनिया से छिपा तुम भिजवाते हो,
जिसे गुप्त रखने में अपनी जान गँवाते हो,
उसे एक शीशे के बक्से में डाल
दुनिया के मनोरंजन हेतु खुले में रख देता है।

इतिहास बड़ी अजीब-सी चीज़ होता है।

जिसके होने-न-होने का तुम्हें आभास न हुआ,
जिसके होने पर भी होने का विश्वास न हुआ,
उसके कारणों की एक लम्बी-सी
प्रामाणिक सूची बना कर देता है।

इतिहास बड़ी अजीब-सी चीज़ होता है।

जिसके अच्छे या बुरे होने का कभी तुम निश्चय न कर पाए,
जिसका पक्ष-विपक्ष करते कितनों ने जीवन बिताए,
उसका वर्गीकरण कितनी ज़्यादा
आसानी से कर देता है।

इतिहास बड़ी अजीब-सी चीज़ होता है।

जिस विचारधारा के अस्तित्व का तुम्हें पता न था,
जिसके विरुद्ध विश्वास के ऊपर कभी विवाद होता न था,
उस विचार का प्रमाण जमा कर
बिना बात के विवाद खड़ा कर देता है।

इतिहास बड़ी अजीब-सी चीज़ होता है।

जो अंतःपुर व अंधी कोठरियाँ तुम बनवाते हो,
हवा या प्रकाश भी न पहुँचे, निश्चित करवाते हो,
उसे लोकतंत्र के राज में पर्यटक-स्थल
बना सबको भेंट कर देता है।

इतिहास बड़ी अजीब-सी चीज़ होता है।

जिसे वह अच्छा बनाना चाहता है,
उसके सब दोष भुला देता है।
जिसे बुरा दिखाना चाहता है,
उसके दिए अवशेष मिटा देता है।
अपनी सुविधा के लिए काले और सफ़ेद
के बीच के सब रंग हटा देता है।

इतिहास बड़ी अजीब-सी चीज़ होता है।

Sunday, September 05, 2004

दो बूँद आँसू

सर दर्द से भारी था,
गला भरा-भरा था।
आँसू का वो कतरा
मानो निकल पड़ा था।

कि तभी दरवाज़े पर दस्तक की आवाज़ आई
दो बूँद आँसू बहाने को समय नहीं निकाल पाई।

फोन की घंटी बजी
शुभचिंतक एक था उस ओर
कुशल क्षेम पूछी गई
बातों का चला एक दौर।

मैं कुशल हूँ, खुश हूँ, ये आश्वस्त तो कर पाई
दो बूँद आँसू बहाने को पर समय नहीं निकाल पाई।

सोना भी ज़रूरी था
वर्ना कल होगी मुश्किल,
अभी नहीं सोई तो कल
जगना कैसे होगा फिर?

आँखें बंद की, कुछ देर बाद ही सही, थोड़ा सो तो पाई,
दो बूँद आँसू बहाने को पर समय नहीं निकाल पाई।

दिन बीतते जा रहे हैं,
ज़िन्दग़ी बढ़ती जा रही है,
कोई कसक है जो मुझे
अंदर-ही-अंदर खा रही है।

ना जाना उसे, ना उसकी कोई परिभाषा ही दे पाई,
दो बूँद आँसू बहाने को समय जो नहीं निकाल पाई।