Wednesday, September 03, 2003

कहीं सच तो नहीं था?

वो निराश निग़ाहें, वो हताश बाँहें,
सहारे की गुहार करती वो आहें,
रास्ते चलते लुट जाने का किस्सा
कहीं सच तो नहीं था?

मैंने दुनिया में जीना सीखा है,
अविश्वास का घूँट पल-पल पीना सीखा है,
पर मेरी ओर बढ़ते उस हाथ का विश्वास
कहीं सच तो नहीं था?

घिरे बादलों में बिजली कभी चमक जाती है,
गलती से उसमें भले राहें दिख जाती हैं
पर दिखा था मुझे जो प्रकाश
कहीं सच तो नहीं था?

क्या मैंने सच में छोड़ दिया है विश्वास?
खड्गसिंह की हरक़त पर बाबा भारती का निःश्वास,
उनकी वो आशंका, वो शक़
कहीं सच तो नहीं था?


Wednesday, August 13, 2003

मैं क्रांतिकारी हूँ

मैं क्रांतिकारी हूँ।

मेरा परिचय, मेरा नाम बम-बंदूकों का मोहताज नहीं
मैं रक्षक हूँ उसका, जिसपर तुम्हें कोई नाज़ नहीं।
क्योंकि वह आह्वान है भविष्य का, पिछड़े कल की आवाज़ नहीं,
क्योंकि वह सीखता है इतिहास से, गिराता वर्तमान पर ग़ाज़ नहीं।

मैं क्रांतिकारी हूँ।

जब राह के सारे काँटे हटाने के बाद भी,
जो चुभ रहा है तुम्हें अभी तक, आज भी,
वो मुक्ति का वाहक, वो सपनों का ग्राहक,
मैं ही हूँ खोखली परम्पराओं की मौत का साज़ भी।

मैं क्रांतिकारी हूँ।

याद है वो गैलिलियो, जिसे तुमने मिटाया था।
याद है वो मीरा जिसे ज़हर पिलाया था।
आज भी जो तुम्हारे नियमों को चुनौती दे रहा है,
उसे दबाने की कोशिश में शोला तुमने बनाया था।

मैं क्रांतिकारी हूँ।

हाँ, तुमने मुझे सड़कों पर चलते देखा है।
वहाँ पड़े हर पत्थर, हर धूलकण से मैंने सीखा है,
कि उपेक्षित और अस्वीकृत में कितना दम होता है,
और उन्हें उनका स्थान दिलाकर इतिहास मैंने लिखा है।

मैं क्रांतिकारी हूँ।

तुम मुझे उपद्रवी का नाम देते हो,
मेरे खून की नदी में अपनी नैया खेते हो,
वह शरीर मर सकता है, जिसमें मैंने रूप धरा है,
क्रांतिकारी नहीं मरता, चाहे ज़हर के कितने प्याले देते हो।

मैं क्रांतिकारी हूँ।

यह हो सकता है कि मैं तुम्हारी सत्ता पलट जाऊँ।
यह हो सकता है कि उससे पहले धूल में मिल जाऊँ।
पर मेरी जीत एक वजह, एक कारण का साथ देने में है,
तुम अपने स्वार्थ के लिए मरते जीत नहीं सकते, मैं कहीं भी जाऊँ।

मैं क्रांतिकारी हूँ।

हाँ, यह सच है मेरे पास भीड़ नहीं, बाहुबल नहीं,
हाँ, सच है कि क्रांतिकारी हज़ारों में एक पैदा होता है,
पर यह भी सच है कि वो एक ही काफी होता है,
इसलिए वो क्रांतिकारी होता है।

मैं क्रांतिकारी हूँ।

Saturday, March 22, 2003

उन्नति और इंसान

काल-चक्र यह नहीं रुकेगा
तेरे रुदन से नहीं झुकेगा
युग बदलेगा, बदलेगा समाज
रुका रहा तो गिरेगी गाज़।

शायद तू सच ही कहता है,
उन्नति में शैतान छिपा है,
विकास-विनाश का अनंत क्रम पर
किसी के समझे नहीं रुका है।

निर्णय तेरा, जीवन तेरा
तू चाहे तो पीछे रुक जा
रो ले कुछ दिन परिवर्तन पर
फिर पीछे रहने पर पछता।

या फिर समय की सुन पुकार,
आँसू को मत बना हथियार,
पौरुष अपना जगा कर देख तू
और धरा पर मत बन भार।

देवत्व अगर आँसू हैं तो,
उसे देवलोक के लिए बचा,
इन्सान बना कर्म करने को,
मानवता से मुँह न छिपा।


Thursday, February 06, 2003

उस देश में आतंकवादी पैदा होते हैं

वो कोई पत्थर नहीं होगा, प्रकृति की गिराई बिजली भी नहीं,
मानव के सधे सचेत हाथ, सोच-समझ कर एक बम गिरा जाएँगे,
पास की गली में खेलते कुछ फुर्तीले बच्चे शायद बच जाएँगे,
आज तुम चुप रहोगे, कल वे तुम्हारे दरवाज़े पर आएँगे,
तुम्हारी चुप्पी, कायरता की हँसी उड़ाएँगे, तुम्हें मार गिराएँगे।

तब यह न कहना कि उस देश में आतंकवादी पैदा होते हैं।

Sunday, June 16, 2002

कहीं कोई रास्ता बुलाता तो है

चौराहे आते हैं, भ्रमित कर जाते हैं,
चलते-चलते मुसाफिर रुक जाता तो हैं,
पर कोई अनजानी-सी शक्ति उसे खींच लेती है,
कहीं कोई रास्ता बुलाता तो हैं।

धूल उड़ती है, आँखों में पड़ती है,
नयनों से पानी छलक जाता तो हैं,
पर किसी प्रेरणा से ख़ुद के हाथ उसे पोंछ लेते हैं,
कहीं कोई रास्ता बुलाता तो हैं।

परेशान हुआ मन, हताश हुआ तन,
रह-रह कर हतोत्साहित कर जाता तो है,
पर चलते रहने की प्रेरणा कोई अदृश्य वाणी दे जाती है,
कहीं कोई रास्ता बुलाता तो हैं।

कविता के शब्द, शब्दों के अक्षर बिखर जाते हैं,
गीत का प्रवाह रुक जाता तो है,
पर कोई सहेज देता है शब्दों को, कलम लौटा जाता है,
कहीं कोई रास्ता बुलाता तो है।

Wednesday, March 27, 2002

काम नहीं रुकता है जग में

काम नहीं रुकता है जग में।

भाग्य से मारे या कर्मों से नाकारे,
रुकने वाले राही सारे,
छोड़ भले जाते हों मग में।
काम नहीं रुकता है जग में।


ना रहें जो हों निकालने वाले,
ख़ुद से ही तो निकल हैं आते,
काँटे जो चुभते हैं पग में।
काम नहीं रुकता है जग में।

शिकारी तन को मार भले दें,
मार नहीं सकते उड़ने की,
इच्छा जो होती है खग में।
काम नहीं रुकता है जग में।


Sunday, March 24, 2002

मेरे लिए समय बोल जाता है

मेरे लिए समय बोल जाता है।

मैं कहती हूँ वो एक हवाई किला है,
सागर का उफान नहीं जल का बुलबुला है।
तुम हँसते हो, कहते हो टक्कर ले लो।
मैं चुप हो जाती हूँ, तुम्हारे साथ की कमी पाती हूँ,
पर एक दिन एक आँधी के झोंके में
वो जड़ से उखड़ जाता है।

मेरे लिए समय बोल जाता है।

मैं सपने देखती हूँ, तुम्हें सुनाती हूँ,
सच हो सकते हैं, उम्मीद के गीत गाती हूँ,
तुम हँसते हो, कहते हो - सच कर लो,
मैं चुप हो जाती हूँ, अपना काम करती जाती हूँ,
एक दिन भाग्य-विधाता खुश हो जाता है,
मेरे सपने को यथार्थ बनाकर झोली में डाल जाता है।

मेरे लिए समय बोल जाता है।

मैं कल्पनाओं की बात करती हूँ, तुम अनुभव सुनाते हो,
अनुभव बुरे हैं, तभी कल्पने चाहिए, ये भूल जाते हो,
तुम हँसते हो, कहते हो - बकवास है ये,
मैं चुप हो जाती हूँ, कल्पनाओं को रूप देती जाती हूँ,
एक दिन उन्हीं कल्पनाओं के साथ
पूरा जग उमड़ आता है।

मेरे लिए समय बोल जाता है।

Tuesday, January 29, 2002

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

बहुत टूट जाती हूँ,
बहुत थक जाती हूँ,
लड़खड़ा कर गिरते-गिरते सहारे के लिए
लाठी एक मिल जाती तो है।

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

विश्वास नहीं रहता,
कोई तर्क नहीं चलता,
पर टूटते हुए मन में कई बार
बिजली सी चमक जाती तो है।

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

खून और लोथड़ों से भरा युद्ध क्षेत्र,
विवशता और आँसू से भरे नेत्र,
मगर विध्वंश की इस बेला में सृष्टि
नव-निर्माण के गीत गुनगुनाती तो है।


कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

विज्ञान में विध्वंश है,
मानव में दैत्यांश है,
पर कुरुक्षेत्र के प्रेरक कृष्ण की प्रेमलीला
एक आशा दिला जाती तो है।

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

क्लांत मन, हताश प्राण,
अंतर से निकल चुकी जान,
पर मृत्युदूत के आने से पहले ही
एक रोशनी झलक जाती तो है।

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

मृत्यु का गान है,
अंत का फरमान है,
पर अँधेरी सुरंग में कभी
शमा एक झिलमिलाती तो है।

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

Saturday, January 20, 2001

मैं मानती हूँ

मैं जानती हूँ,
कि साधारण पत्थर होकर
पहाड़ से टक्कर ली है।

मैं जानती हूँ,
कि आज मेरी चोट
मुझपर उलटी पड़ी है।

मैं जानती हूँ,
कि मुश्किल है सागर के
पानी को मीठा करना।

मैं जानती हूँ,
कि मैं हूँ एक साधारण
छोटा तालाब या झरना।

मैं जानती हूँ,
कि छोटा सा है मेरा जीवन
पूरा ना हो सकेगा मन।

पर

मैं मानती हूँ,
औऱ भी बिखरे पत्थर हैं,
मिलकर पहाड़ बना देंगे।

मैं मानती हूँ,
काँटे की टक्कर होगी,
ज़मीन समतल बना देंगे।

मैं मानती हूँ,
सागर झुक जाएगा एक दिन
मेरे अस्तित्व के सामने।

मैं मानती हूँ,
क्योंकि आज मैं हूँ
कल सब आएँगे हक़ माँगने।

मैं मानती हूँ,
कि सफल हो जाऊँगी मैं
अगर हो गया यह सब
मेरे जाने के बाद भी -
क्योंकि हर फल और फूल में
बीज के अंश और प्राण होते हैं।

इसलिए मैं मानती हूँ,
कि मुझे करना चाहिए-
कि मुझे बढ़ना चाहिए।


Tuesday, January 09, 2001

क्यों आए?

मैंने तो छोड़ दी थी तुम्हारी खोज
मैंने तो मान लिया था
कि तुम इस दुनिया के नहीं हो,
मैंने तो तुम्हारे बिना ही
रहने की और खुश रहने की
आदत डाल ली थी,
मैंने तो मान लिया था
कि जीवन में उजाले के लिए
खुद ही जलना पड़ता है -
मैंने को मान लिया था
कि प्यास लगने पर खुद के
आँसुओं को ही
पीना पड़तो है।।

मैने तो छोड़ दी थी ये कल्पना
कि हर चोट के या सफलता के बाद
किसी को अपने आँसू दिए जा सकते हैं-
ऐसे ही कभी
उसके आँसू लिए जा सकते हैं-

और शायद मैं भूल गई थी,
कि हँसना औपचारिकता नहीं होती,
बोलना मजबूरी नहीं होती -

लेकिन मैंने अपने हिसाब से
एक सत्य ढूँढ़ लिया था -
अखंड-अटूट

क्यों खंडित कर दिया उसे?
क्यों एक रोशनी लेकर आए?
क्यों मेरे आँसू माँगे दोस्त?

नहीं जानती कि मैं दुखी हूँ या खुश!