Thursday, February 06, 2003

उस देश में आतंकवादी पैदा होते हैं

वो कोई पत्थर नहीं होगा, प्रकृति की गिराई बिजली भी नहीं,
मानव के सधे सचेत हाथ, सोच-समझ कर एक बम गिरा जाएँगे,
पास की गली में खेलते कुछ फुर्तीले बच्चे शायद बच जाएँगे,
आज तुम चुप रहोगे, कल वे तुम्हारे दरवाज़े पर आएँगे,
तुम्हारी चुप्पी, कायरता की हँसी उड़ाएँगे, तुम्हें मार गिराएँगे।

तब यह न कहना कि उस देश में आतंकवादी पैदा होते हैं।

Sunday, June 16, 2002

कहीं कोई रास्ता बुलाता तो है

चौराहे आते हैं, भ्रमित कर जाते हैं,
चलते-चलते मुसाफिर रुक जाता तो हैं,
पर कोई अनजानी-सी शक्ति उसे खींच लेती है,
कहीं कोई रास्ता बुलाता तो हैं।

धूल उड़ती है, आँखों में पड़ती है,
नयनों से पानी छलक जाता तो हैं,
पर किसी प्रेरणा से ख़ुद के हाथ उसे पोंछ लेते हैं,
कहीं कोई रास्ता बुलाता तो हैं।

परेशान हुआ मन, हताश हुआ तन,
रह-रह कर हतोत्साहित कर जाता तो है,
पर चलते रहने की प्रेरणा कोई अदृश्य वाणी दे जाती है,
कहीं कोई रास्ता बुलाता तो हैं।

कविता के शब्द, शब्दों के अक्षर बिखर जाते हैं,
गीत का प्रवाह रुक जाता तो है,
पर कोई सहेज देता है शब्दों को, कलम लौटा जाता है,
कहीं कोई रास्ता बुलाता तो है।

Wednesday, March 27, 2002

काम नहीं रुकता है जग में

काम नहीं रुकता है जग में।

भाग्य से मारे या कर्मों से नाकारे,
रुकने वाले राही सारे,
छोड़ भले जाते हों मग में।
काम नहीं रुकता है जग में।


ना रहें जो हों निकालने वाले,
ख़ुद से ही तो निकल हैं आते,
काँटे जो चुभते हैं पग में।
काम नहीं रुकता है जग में।

शिकारी तन को मार भले दें,
मार नहीं सकते उड़ने की,
इच्छा जो होती है खग में।
काम नहीं रुकता है जग में।


Sunday, March 24, 2002

मेरे लिए समय बोल जाता है

मेरे लिए समय बोल जाता है।

मैं कहती हूँ वो एक हवाई किला है,
सागर का उफान नहीं जल का बुलबुला है।
तुम हँसते हो, कहते हो टक्कर ले लो।
मैं चुप हो जाती हूँ, तुम्हारे साथ की कमी पाती हूँ,
पर एक दिन एक आँधी के झोंके में
वो जड़ से उखड़ जाता है।

मेरे लिए समय बोल जाता है।

मैं सपने देखती हूँ, तुम्हें सुनाती हूँ,
सच हो सकते हैं, उम्मीद के गीत गाती हूँ,
तुम हँसते हो, कहते हो - सच कर लो,
मैं चुप हो जाती हूँ, अपना काम करती जाती हूँ,
एक दिन भाग्य-विधाता खुश हो जाता है,
मेरे सपने को यथार्थ बनाकर झोली में डाल जाता है।

मेरे लिए समय बोल जाता है।

मैं कल्पनाओं की बात करती हूँ, तुम अनुभव सुनाते हो,
अनुभव बुरे हैं, तभी कल्पने चाहिए, ये भूल जाते हो,
तुम हँसते हो, कहते हो - बकवास है ये,
मैं चुप हो जाती हूँ, कल्पनाओं को रूप देती जाती हूँ,
एक दिन उन्हीं कल्पनाओं के साथ
पूरा जग उमड़ आता है।

मेरे लिए समय बोल जाता है।

Tuesday, January 29, 2002

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

बहुत टूट जाती हूँ,
बहुत थक जाती हूँ,
लड़खड़ा कर गिरते-गिरते सहारे के लिए
लाठी एक मिल जाती तो है।

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

विश्वास नहीं रहता,
कोई तर्क नहीं चलता,
पर टूटते हुए मन में कई बार
बिजली सी चमक जाती तो है।

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

खून और लोथड़ों से भरा युद्ध क्षेत्र,
विवशता और आँसू से भरे नेत्र,
मगर विध्वंश की इस बेला में सृष्टि
नव-निर्माण के गीत गुनगुनाती तो है।


कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

विज्ञान में विध्वंश है,
मानव में दैत्यांश है,
पर कुरुक्षेत्र के प्रेरक कृष्ण की प्रेमलीला
एक आशा दिला जाती तो है।

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

क्लांत मन, हताश प्राण,
अंतर से निकल चुकी जान,
पर मृत्युदूत के आने से पहले ही
एक रोशनी झलक जाती तो है।

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

मृत्यु का गान है,
अंत का फरमान है,
पर अँधेरी सुरंग में कभी
शमा एक झिलमिलाती तो है।

कहीं कोई किरण नज़र आती तो है।

Saturday, January 20, 2001

मैं मानती हूँ

मैं जानती हूँ,
कि साधारण पत्थर होकर
पहाड़ से टक्कर ली है।

मैं जानती हूँ,
कि आज मेरी चोट
मुझपर उलटी पड़ी है।

मैं जानती हूँ,
कि मुश्किल है सागर के
पानी को मीठा करना।

मैं जानती हूँ,
कि मैं हूँ एक साधारण
छोटा तालाब या झरना।

मैं जानती हूँ,
कि छोटा सा है मेरा जीवन
पूरा ना हो सकेगा मन।

पर

मैं मानती हूँ,
औऱ भी बिखरे पत्थर हैं,
मिलकर पहाड़ बना देंगे।

मैं मानती हूँ,
काँटे की टक्कर होगी,
ज़मीन समतल बना देंगे।

मैं मानती हूँ,
सागर झुक जाएगा एक दिन
मेरे अस्तित्व के सामने।

मैं मानती हूँ,
क्योंकि आज मैं हूँ
कल सब आएँगे हक़ माँगने।

मैं मानती हूँ,
कि सफल हो जाऊँगी मैं
अगर हो गया यह सब
मेरे जाने के बाद भी -
क्योंकि हर फल और फूल में
बीज के अंश और प्राण होते हैं।

इसलिए मैं मानती हूँ,
कि मुझे करना चाहिए-
कि मुझे बढ़ना चाहिए।


Tuesday, January 09, 2001

क्यों आए?

मैंने तो छोड़ दी थी तुम्हारी खोज
मैंने तो मान लिया था
कि तुम इस दुनिया के नहीं हो,
मैंने तो तुम्हारे बिना ही
रहने की और खुश रहने की
आदत डाल ली थी,
मैंने तो मान लिया था
कि जीवन में उजाले के लिए
खुद ही जलना पड़ता है -
मैंने को मान लिया था
कि प्यास लगने पर खुद के
आँसुओं को ही
पीना पड़तो है।।

मैने तो छोड़ दी थी ये कल्पना
कि हर चोट के या सफलता के बाद
किसी को अपने आँसू दिए जा सकते हैं-
ऐसे ही कभी
उसके आँसू लिए जा सकते हैं-

और शायद मैं भूल गई थी,
कि हँसना औपचारिकता नहीं होती,
बोलना मजबूरी नहीं होती -

लेकिन मैंने अपने हिसाब से
एक सत्य ढूँढ़ लिया था -
अखंड-अटूट

क्यों खंडित कर दिया उसे?
क्यों एक रोशनी लेकर आए?
क्यों मेरे आँसू माँगे दोस्त?

नहीं जानती कि मैं दुखी हूँ या खुश!


Monday, August 28, 2000

कर्मवाद

मैं चली जा रही थी
सीधी-समतल सड़क पर।
नकारती तुम्हारा अस्तित्व
मानवीय क्षमताओं की अकड़ पर।

सामने तभी एक पतला
छिछल-सा नाला आया।
कल्पनाओं में उड़ते मेरे मन को
यथार्थ का वह स्पर्श न भाया।

झुका तो नहीं था वह अभी
कुछ परिवर्तन हुए ज़रूर।
अस्तित्व तुम्हारा मानने तो लगा,
टूटा अभी पर नहीं था ग़रूर।

"बस पार करा दो इसे",
उस दिन उसने प्रार्थना की थी।
"इसके बाद और कुछ नहीं",
अकड़ भरी 'याचना' की थी।

दया दिखाई थी तुमने,
पार करा दी वह मुसीबत।
सोचा उसने पा ली मंज़िल,
पर अचानक गया था ठिठक।

सामने उफन रही थी नदी,
उसे फिर तुम्हारा ध्यान आया।
ग़रूर के शीशे को चूर कर,
हाथ जोड़ तेरे पास वो आया।

विनती वह हो गई स्वीकार,
बचे हुए आत्माभिमान के साथ,
बढ़ा ढूँढ़ने मंज़िल को,
विश्वास लेकर अपने हाथ।

आत्माभिमान भी अपना
कर दिया तुम्हें अर्पण,
सामने खड़े पहाड़ ने जब
दिखाया उसे सही दर्पण।

फिर आया सपनों का 'समतल'
जब मैदान उसके सामने - देख हक़ीकत,
सर्वस्व व्यर्थ जानकर अपना
कर कर दिया समर्पण तेरे आगे।

मान गया वह कठपुतली है,
तेरे अजर-अमर हाथों की।
भाग्यवाद की बात नहीं है,
कर्मवाद का सार यही है।

Wednesday, July 05, 2000

ज़िन्दग़ी और गाड़ी

बात सही ही है किसी की,
इन्सानी इस ज़िन्दग़ी की,
सही उपमा गाड़ी ही है।
चलती वो भी ज़िन्दग़ानी भी है।

अलग-अलग दौर होते ज़िन्दग़ी के,
अलग-अलग तरह की होती हैं गाड़ियाँ।
हर क़िस्म की गाड़ी चलती रहती है।
वैसे ही चलती हैं हर दौर की कहानियाँ।

बचपन यहाँ हुआ करता है
सुपर फास्ट ट्रेन की तरह,
'चिन्ता' जैसे अनारक्षित लोगों के लिए
माफ़ करना होती नहीं इसमें जगह।

चालक को कुछ सोचना रहती नहीं,
निर्देश सारे आते हैं कहीं और से।
निश्चिंत, निर्विघ्न गुज़र जाते हैं लोग
बड़ों की छाया में बचपन के दौर से।

फिर आती है बस चलाने की बारी,
भीड़-भाड़ और धूल भरी सड़क पर।
अपने विवेक से निर्णय लेने पड़ते हैं
आदमी आता है जब यौवन की दहलीज पर।

हर क्रॉसिंग पर रुकती हुई,
चलती है सवारी गाड़ी बेटिकटों को भी ढोती हुई,
कटता है बुढ़ापा यों ही झुकता हुआ,
देता अपना बलिदान सबके लिए रुकता हुआ।


Thursday, April 13, 2000

मैं अकेली हूँ

अकेलेपन! तुझसे क्या शिक़ायत करूँ?
मैं ही तो खींच लाई हूँ तुझे।

क्योंकि मैं अकेली रहना चाहती हूँ,
गुटनिरपेक्षता मेरी
रग-रग में
समाई हुई है।

लेकिन मैं खुश हूँ
तुझे पाकर ही।
क्योंकि तू स्थायी है।
और इस स्थायित्व पर
गर्व कर सकती हूँ मैं।
तुझे साथ लिए, मज़े में
जी और मर सकती हूँ मैं।

किस बात का दुःख हो मुझे?
अकेली हूँ इसका?

पर क्या वो अकेले नहीं
जो धारा में
बहे जा रहे हैं सबके साथ?
कभी भी धारा के बीच
किसी शिलाखंड से टकरा
बेहोश हो जाएँगे।
और कुछ देर बाद
आँखें खुलने पर पाएँगे
कि कोई नहीं रुका -
तो क्या वो अकेले नहीं थे?

तो फिर क्यों ग़म हो मुझे?

मैं अकेली नज़र आती हूँ
क्योंकि मैं
उनकी तरह
किसी को पूज नहीं सकती,
ना ही किसी पर थूक सकती हूँ।
मैं राम-राज्य के सपने नहीं देखती,
ना ही उदास क्षणों में
मरने की बात करती हूँ।
क्योंकि मैं कुबेर-कोष की नहीं सोचती,
न ही सर्वस्व दान की बात करती हूँ।
क्योंकि मैं अपनी पहुँच तक पाप नहीं करती,
ना ही महात्मा होने का
ढोंग रचती हूँ।
क्योंकि मैं आवश्यकता-पूर्ति के
उद्यमों से नहीं डरती,
ना ही बिना काम के
आग पर पैर धरती हूँ।

लेकिन मैं खुश हूँ
क्योंकि मैं
उनसे ज़्यादा अकेली नहीं,
जो कभी पूजकर कभी थूकते हैं,
कभी आकाश, कभी पाताल
में होते हैं।
कभी कुबेर, कभी गुदड़ीलाल
बनते हैं।
कभी दुरात्मा, कभी महात्मा
ख़ुद को कहते हैं।
कभी शोलों पर चलने की कहते हैं,
कभी एक दिये से डरते हैं।

क्योंकि वो नहीं अपनाना चाहते तुझे
दूर भागते हैं तुझसे,
अपनी नियति से,
इसलिए नाखुश हैं,
बेचैन हैं,
उदास हैं।

पर मैं खुश हूँ
क्योंकि मैंने अपनाया है तुझे।
दबाव में नहीं - स्वेच्छा से - हँसकर।
मैं नियति को चुनौती नहीं दूँगी -
पर वो जहाँ तक बढ़ाएगी
वहाँ पहुँचने में
नहीं चूकूँगी।

हालाँकि, मैं अकेली हूँ।