Tuesday, May 06, 1997

गुलाम कौन था?

सृष्टि के आरंभ से अब तक
गुनगुनाता है ये इतिहास,
युद्धों की श्रृंखला के गीत
जिसमें नहीं होता मेरा अहसास।

मैंने भी जलाया है अपना शरीर
इन युद्धों की चिताओं पर।
लेकिन मेरा नाम कोई नहीं लिखता
सहानुभूति से इतिहास की गाथाओं पर।

क्योंकि मैं उन बर्बर शासकों का अदना सैनिक था
जिन्होंने सिन्धु-ह्वांगहो सभ्यताओं के नष्ट किया था।
क्योंकि मैं उस गोरी के टुकड़ों पर पलता था,
जिसने तुम्हारी संस्कृति को भ्रष्ट किया था।

क्योंकि मैं उस सिकंदर की सेना का अंग था,
जिसकी आकांक्षा के आड़े आ न सकी इंसानियत।
क्योंकि मैं हिटलर और मुसोलिनी का एक प्यादा था
जिनकी हर चाल में छिपी थी हैवानियत।

क्योंकि मैंने दूर किया था तुम्हें
तुम्हारे बीवी-बच्चों घर और परिवार से,
मदद की थी उन वहशी दरिंदों की नाता जोड़ने में
तुम मासूमों का दासों के बाज़ार से।

क्योंकि तुम्हारे मदमत्त शासकों के सैनिक के रूप में
मैंने बरसाई थी तुम पर गोलियाँ बदले में कुल्हाड़ियों के,
किसी के इशारे पर उतार फेंका था तुम्हें
फर्स्ट-क्लास के डब्बे से रेलगाड़ियों से।

लेकिन क्या विश्वास करोगे आज मेरी बात पर
काँपे थे हाथ मेरे गर्दनें तुम्हारी काटते हुए।
चीत्कार कर उठा था मेरा हृदय भी
मौत का या घृणित प्रसाद बाँटते हुए।

रो उठा था मेरे भीतर का इंसान,
किलकारी का रुदन में बदलना सब नहीं पाया था मैं।
वह आगजनी, नरसंहार और मुनाफ़े की हवस देख
विचलित हुए बिना रह नहीं पाया था मैं।

रोक लिया था मुझे मेरी आत्मा ने आगे बढ़ने से इस पथ पर,
लेकिन पीछे मुड़ा तो खड़ा था कोई सिकंदर।
आँखों में हैवानियत का खून उतारे
वो था कोई गोरी, गजनी, मुसोलिनी या हिटलर।

उसकी आँखों की गहराई में मुझे
नज़र आ गया था इस कोशिश पर अपने विनाश का दृश्य।
"जी हुज़ूर", "यस माई लार्ड" कहकर
मैं दुहराने पर मजबूर था अपने वो ही कृत्य।

तुम गुलाम थे तो विद्रोह किया अपनी मर्ज़ी से,
लेकिन मैंने तो अपने मन और इंसानियत को मार ही डाला था।
तुम्हारे बलिदान पर तो सहानुभूति के दो शब्द भी थे,
लेकिन मैं तो त्रिशंकु की तरह ही लटकने वाला था।

तुम गुलाम थे, मानता हूँ,
लेकिन तुमने विद्रोह तो किया।
और मैं "विजय" का सुख भोगते हुए
अपनी आत्मा की धिक्कार सुनता रहा।

आज यदि लोग तुम्हारा नाम नहीं भी जानते हैं,
तो भी श्रद्धा-सुमन चढ़ाते हैं अनजाने नाम पर ही।
पर मुझे अनजाने में ही याद करते हैं मूर्ख और बर्बर के रूप में
जो विजेता कहलाने के लिए मिट गया अपनी खोखली आन पर ही।

बताओ गुलाम कौन था?
तुम या मैं?

Friday, April 18, 1997

मेरी ज़रूरत

ज़िन्दग़ी के इस तमाशे में
जब तक ख़ुद भी कोई तमाशा बनकर
चलती हूँ, तब तक दोस्त की कमी
महसूस नहीं होती इस पथ पर।

लेकिन कभी जब बनकर मूकदर्शक
नज़र फेरती हूँ इन तमाशों पर,
मेरी अनुपस्थिति का कोई प्रभाव
नज़र नहीं आता है लोगों पर।

टीस उठती है दिल में
कि मेरी कोई नहीं पहचान।
मैं किसी की ज़रूरत नहीं हूँ
हर कोई मानो हो मुझसे अनजान।

इच्छा होती है उस वक़्त कि काश!
मैं भी होती किसी की ज़िन्दग़ी का हिस्सा,
किसी की ज़िन्दग़ी के हर पृष्ठ पर होता
उसका मुझसे जुड़ा कोई किस्सा।

हाँ, एक दोस्त की कामना है मुझे
जिसे भी हो मेरी ज़रूरत।
मेरी अनुपस्थिति पर अभाव का अहसास
हो उसकी ज़िन्दग़ी की एक हक़ीकत।

Thursday, April 10, 1997

मेरी पहचान, मेरी कविताएँ

जब ज़िन्दग़ी बेगानी लगती है
तो मुड़कर देखती हूँ अपनी कविताएँ।
मैं क्या थी क्या हो गई हूँ,
शायद कोई अता-पता मिल जाए।

बता देती हैं ये कि मैंने
क्या खोया है, क्या पाया है,
क्या भूली हूँ, क्या सीखा है,
क्या सोचकर क्या गुनगुनाया है।

मिल जाता है इनमें मुझे कि
मैंने क्या सोचा था, क्या देखा था कभी।
बदलाव मुझमें भी नज़र आ जाता है
सोचकर कि क्या नज़रिया है अभी।

मैं क्या सोचती हूँ, क्या देखती हूँ,
क्या मानती हूँ, क्या जानती हूँ,
क्या चाहती हूँ, क्या कहती हूँ,
क्या खोजती हूँ, क्या मानती हूँ?

अब तक के इस सफ़र में मैंने
क्या खोया है, क्या पाया है?
सम्पूर्ण रूप में ऐसा कहो -
मेरा पूरा परिचय क्या है?

ढूँढ़ना चाहते हो तो ढूँढ़ो
शायद इन्हीं में मिल जाए,
क्योंकि मैं तो मेरी कविताएँ ही हूँ,
और मेरी पहचान, मेरी कविताएँ।

Saturday, March 22, 1997

रंग

अरे! रंग कहाँ नहीं हैं,
जो होली के रंग इतने बड़े हैं?
नज़र तो फेरो ज़िन्दग़ी पर
सैकड़ों रंग यहाँ बिखरे पड़े हैं।

रंगों में ही डूबी है रंगीली दुनिया
कुछ भाग लेकिन बिल्कुल बेरंग पड़े हैं।
रंग तो उन चीज़ों में से एक है,
जो विधाता ने सृष्टि के संग गढ़े हैं।

इन्द्रधनुषी रंगों से शोभा है बढ़ी,
ये ही मिलकर बना देते हैं तेज धूप।
रंग ही तो चीज़ है जो गिरगिट बदलती है,
भई! इन रंगों का कमाल भी है बहुत खूब।

ज़िन्दग़ी के रंग हम कई देखते हैं,
आदमी भी रंग बदलने में है माहिर।
रंगों के खेल पर ही दुनिया टिकी है,
बात बिलकुल साफ़ है और जग-ज़ाहिर।

खून के रंग से आज लाल है धरती,
शैतानियत का रंग भी परवान चढ़ा है।
रंग को बदरंग बनाता हुआ भाई!
हर इंसान के ऊपर कोई शैतान चढ़ा है।

खुशियों का रंग है फीका पड़ चुका,
हर सही रंग ही बदरंग हो गया।
आँसुओं की रंगहीन ही धार रह गई,
हर जगह रंग में है भंग हो गया।

हर विकल्प से निरुपाय होकर
होली के रंगों में कोशिश करते हैं हम,
डुबाने की खीझ, हताशा और निराशा
भुलाने को ज़िन्दग़ी के सारे ग़म।

लेकिन कब तक कच्ची इस डोर के संग
काट पाएँगे हम अपना जीवन?
कब तक यों ही बदरंग करते जाएँगे
ज़िन्दग़ी का सुंदर सुहाना हर एक रंग?

Thursday, March 20, 1997

मेरे घर!

मेरे घर! तेरी हर पल की दूरी ने मुझे
हर पल तेरा अहसास दिलाया है।
हर तूफ़ान के बाद तू ही मुझे शरण देगा
हर पल ऐसा अहसास दिलाया है।

मेरी बढ़ती परिरक्वता को भी
ज़रूरत है तेरी छाँव की।
अथाह सागर का पार पाने को
ज़रूरत है तेरी नाव की।

मेरी हर चोट की ज़रूरत है
बस तेरा ही मरहम।
तू और तुझमे रहने वाले ही
बाँट पाएँगे मेरे गम।

याद है आज भी मुझे, तेरा ही
सपना देखती मेरी आँखें।
तेरे बनने से व्यस्त हैं जो
कभी सूनी-सूनी थी राहें।

तेरी एक-एक ईंट में
मेरा कोई सपना छिपा है।
हर एक कतरे पर तेरे
मेरा कोई ख़्वाब लिखा है।

तेरे किसी अंग से मिलकर
जब उल्लसित होता है मेरा मन।
महसूस होता है मुझे तब कि
कैसा है तेरा-मेरा अपनापन!

Thursday, February 27, 1997

पिछली गलियाँ

कल तक जो गलियाँ पहचानी थीं,
आज उनके लिए मेहमान हूँ मैं।
क्या पता आज जो मेरे अपने हैं,
कल उनके लिए अनजान रहूँ मैं।

आगे भागती ज़िन्दग़ी की राहों में कभी
जब पिछली गलियों में चलने का मौका मिलता है,
कहीं, किसी कोने में मन के सोया हुआ
अतीत का रंग-बिरंगा फूल तब खिलता है।

किसी जानी-पहचानी चौखट की ओर
बढ़ते हुए रुक जाते हैं क़दम।
मेरी जगह उनके दिलों में किसी और ने ले ली होगी
सोचकर यह सिहर जाता है बदन।

आँखों को नज़र आता है
कुछ साथियों का बदला रूप।
खिलखिलाते सामने से गुज़र जाते हैं
देकर मुझे अतीत से एक कतरा धूप।

पहचान नहीं पाते वे मुझको,
भावनाएँ पहुँचती नहीं उनतक।
दोष उनका भी नहीं है,
मैं भी तो बदल चुकी हूँ अबतक।

गलियों के भाग जहाँ काँटे बिछे थे,
उनपर चलकर ही गलियाँ पार की थीं मैंने।
काँटों के साथ घावों के निशान भी मिट चुके थे,
जिनकी टीस कभी झेली थी मैंने।

ध्यान आता है तभी कि अब
इन गलियों में लौटकर क्या फ़ायदा?
सीधी सड़क पर ही आगे चलूँ तो
शायद अच्छा रहेगा ज़्यादा।

काफ़ी है कि याद कर लिया मैंने
बीते हुए समय को।
वे यादें, भय के वक़्त मुझको
बनाएँगी अभय जो।

Sunday, February 23, 1997

रुकना सीख लो

हर वक़्त अपने दिल की सोचने वालों,
कभी दूसरों के भी दिल में झाँको।
स्वार्थ सदा ही ख़ुद का देखने वालों,
सोचो कामनाएँ औरों की भी हैं लाखों।

हर क़दम उठाने से पहले सोचो,
उसके नीचे कुचले जाने वालों में तुम होते तो!
मौत का प्रसाद बाँटने से पहले सोचो,
उनकी जगह मौत की नींद तुम जो सोते तो!

दूसरों पर हँसने से पहले जान लो,
तुम भी कोई अंतर्यामी नहीं हो।
भूल कल को तुमसे भी होगी
हर चीज़ के तुम भी ज्ञानी नहीं हो।

कुछ कहने-मानने से पहले ये भी सोचो,
सामने कोई तुमसे कमज़ोर नहीं है।
आज सच हो, तो कल झूठ हो जाओगे,
क़िस्मत के फेर पर किसी का ज़ोर नहीं है।

कितनी उम्र काट ली है तुमने,
जो ज़िन्दग़ी से जीत जाओगे?
हार मानना भी सीख लो तुम,
तभी कल जीत के गीत गाओगे।

हारो नहीं ज़िन्दग़ी से पर,
कभी-कभी झुकना सीख लो।
अवरुद्ध न करो राहें ज़िन्दग़ी की
पर असहायों के लिए रुकना सीख लो।

Wednesday, February 19, 1997

ज़िन्दगी! नहीं मानूँगी भार तुझे

ज़िन्दगी! नहीं मानूँगी भार तुझे
अब नहीं मानूँगी हार तुझसे।

कब तक ढोती जाऊँगी तुझे
ग़म और अंधकार को यथार्थ बनाकर?
कब तक मानूँगी तुझे वो दरिया
जहाँ सुख की किश्ती डूबी मझधार में आकर?


ऐ ज़िन्दगी की पूर्णिमा! सुन ज़रा,
कब तक तू दूर भागेगी मुझसे?
तू रूठ जाए तो रूठ, पर तुझे मान कल्पित
कभी भी मैं नहीं रूठूँगी तुझसे।

कर्म करने को आई हूँ मैं,
हमेशा ग़म ढोने को नहीं!
कुछ कर गुज़रने को जन्मी हूँ मैं
ज़िन्दगी! तुझसे पराजित होने को नहीं।

नहीं कहती कि दुःख आएँगे नहीं,
दावा नहीं करती कि मैं रोऊँगी नहीं।
नहीं मानती कि सुख सारे मिल जाएँगे मुझे
पर ज़िन्दगी! तुझे मैं खोऊँगी नहीं।

तमाशा कहा है तुझे लोगों ने,
तमाशा समझ कर ही जिऊँगी मैं।
दुःख तो आएँगे ही पर आज या कल
सुख! तेरा भी रस पिऊँगी मैं।

न भी पी पाऊँ तो असफलों
की गिनती में नहीं आऊँगी मैं।
उदाहरण दूसरों का लेकर
खुद एक उदाहरण बन जाऊँगी मैं।

Sunday, February 16, 1997

इन पलकों के भीतर

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
कितनी ही भूली-बिसरी यादें
प्रत्यक्ष-सी कुछ कड़वी-मीठी बातें।

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
कितने ही छूटे हुए साथी
यादें उनकी दर्शन उनके कराती।

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
कितने ही हो चुके पापों के प्रमाण,
वे चेहरे जो निकले नहीं सरेआम।

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
कितने ही पुण्यात्माओं की तस्वीरें
जय-जयकार जिनकी नहीं कर पाती धीरे।

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
अतीत में देखे गए कितने ही स्वप्न,
जिनका बाहर की दुनिया में हो चुका अस्तित्व खत्म।

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
आकांक्षाएँ वैसी कितनी ही
कुछ जो पूरी हुईं, कुछ रह गईं।

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
आज की दुनिया के कितने ही चित्र
भविष्य की राह पर जो बन जाएँगे मित्र।

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
अच्छे-मीठे कितने ही स्वप्न
जो सँजोए हैं ताकि हो न खत्म।

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
कितनी ही सोची हुई इच्छाएँ
जो शायद भविष्य में पूरी हो जाएँ।

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
कितने ही आँसू रखे हैं,
जिन्हें रोका है और अब तक नहीं बहे हैं।

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
कितनी हृदय-विदारक बातों की तस्वीर,
कितनी ख़ूबसूरत चीज़ें जो लगती हैं हीर।

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
उस स्वार्थ से चेहरे पर भरी ग्लानि
जिससे अक्सर दूसरों की हुई हानि।

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
दूसरों पर आए गुस्से की लाली
जिन्हें मन-ही-मन देकर रह गई गाली।

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
कितनी ही फूटती आशा की किरणें
संग उत्साह के जो बढ़ी मंज़िल से मिलने।

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
कितने आँसू जिनका कारण होगी खुशी,
और जो अभी तक निकलने हैं बाकी।

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
अच्छे-बुरे कितने ही दृश्य
सुकर्म-कुकर्म के कितने ही कृत्य।

इन पलकों के भीतर
आँखें बंद करने पर,
शायद सारा का सारा जीवन
जहाँ तक की दूरी माप सकता मेरा मन।

Monday, February 03, 1997

शोषित

शोषित! तू हमेशा, हर युग में शोषित ही रहा है,
किसी-न-किसी रूप में शोषण-योग्य घोषित ही रहा है।
जब तक तेरा मालिक कोई इन्सान न था,
तेरा शोषण इस प्रकृति ने किया।
शासक और शासित में बँट गई जब सभ्यता,
तेरा शोषण शासकों की सृष्टि ने किया।
किसान बनकर शोषित ही रहा तू
सामंतों ने था तुझे सर्फ बनाया,
पूँजीपतियों ने घोषित किया सर्वहारा,
तेरे उद्धार को फिर साम्यवाद था आया।

हर युग में तूने कोई संघर्ष किया है,
शोषण का ही किंतु फिर गरल पिया है।

सभ्यता का सूर्य उगा जो पश्चिम में
उलटा उगकर उसने उलटा ही काम किया था,
दास बनकर ठूँसा गया जहाजों में
तू ही था जो बेड़ियों में बँध के जिया था।

सभ्यता का भवन बन चुका है जो आज
तू ही है जो उसकी हर नींव बना है,
पर नींव की तरह ही मिट्टी के नीचे तू
सड़ता हुआ घुट-घुट कर आज भी पड़ा है।