Thursday, November 07, 1996

मेरा नाम आदमी

मुझे याद है कि बचपन में,
धर्म और जाति की उलझन में,
मैंने माँ से पूछा था,
"माँ! बताओ मेरा धर्म है क्या?"
जाति भी मैंने पूछी थी,
पर वह मुझसे नहीं रूठी थी।
शान से सर उठाकर उसने था बताया,
"हिन्दू घर में बेटी तूने जन्म है पाया।
बेटी! तू एक ब्राह्मण घर से सम्बद्ध है,
यह समाज तुझे देवी मानने को कटिबद्ध है।"
काश! उस वक़्त बताया होता मुझे,
"मानवता का धर्म मिला है तुझे,
और भारतीयता है तेरी जाति"
काश! लिखी जाती दिल पर एक अमिट पाती।

कभी एक बुजुर्ग ने एक इन्सान था दिखाया,
और कुछ इस रूप में उससे परिचय था करवाया,
"इसने तुझसे पहले माँ की कोख से जन्म है पाया,
इसलिए ये तेरा सगा भैया कहलाया।"
काश! उन्होंने मुझे बताया होता,
कानों में प्रेम का मंत्र ये गाया होता,
"इन्सान हैं इस विशाल विश्व में जितने,
सभी के सब हैं तेरे सगे अपने।"
काश! इन्सानियत का पाठ पढ़ाया होता,
तो आज इन्सान बनकर मैंने भी दिखाया होता।

याद है मुझे कभी बचपन में,
बाँट कर खेले थे मैंने सारे खिलौने।
डाँट पड़ी थी मुझे कितनी फिर घर में,
सिखाया था कि न जाना उनके संग खेलने।
फिर 'क्यों' का जवाब कुछ मिला था मुझे ये,
"मुस्लिमों के संग रह च्युत होना न धर्म से।"
काश! मुझे उस वक़्त प्रोत्साहन मिला होता,
किसी को फिर कट्टरता का मुझसे आज न ग़िला होता।
ज़रूरत ना होती मुझे फिर आज ये कहने की,
"स्वार्थ से बनी मैं मेरा नाम आदमी"

Thursday, October 17, 1996

एक और क्रांति

एक क्रांति है हो रही रुकने नहीं देना है,
जो गौरव है खो चुका वापस फिर लेना है।
बस एक चाहिए प्रयास ताकि ज़ुल्मों का अंत हो,
क़यामत के प्रश्नों में हर राष्ट्रद्रोही बंद हो।
पर्दा है खुल रहा सटने नहीं देना है,
जो गौरव है खो चुका वापस फिर लेना है।

ऐ गद्दी के मलिक! इस क्रांति को दबाओ मत,
एक स्वप्न जो है दिख रहा, उसे तुम मिटाओ मत।
क्या नहीं हुए आज तक तुम ज़ुल्म के शिकार?
रोता नहीं हृदय तुम्हारा सुनकर हाहाकार?
एक चिंगारी जो भड़की है उसे बस बुझाओ मत,
आगे बढ़ने वालों के पीछे को भगाओ मत।

यदि रोकोगे तो कर लो तुम्हें जो भी कर लेना है,
मार्ग के हर गड्ढे को भर हमें भी देना है।

आगे बढ़ना चाहती है आज धरा की ये बेटी,
जोश भरने के लिए लेकर चूसित खून की पेटी।
ऐ राष्ट्र! ऐ समाज! इसे रोकना नहीं,
साथ नहीं दे सकते तो टोकना नहीं,
है शोषणों के पालने में बचपन से ये लेटी,
बर्दाश्त नहीं होगी इससे अब तुम्हारी ये हेठी।

एक दीपक से ज्वाला बना इसे देना है,
आमंत्रित हैं वो जिन्हें दायित्व ये लेना है।

एक और क्रांति अपना संदेश तुम्हें दे रही,
कमल लाल और एक रोटी तुम्हें दे रही,
जान के डर से पीछे कभी भी हटना नहीं,
कर ऐसा राष्ट्रद्रोही तुम एक और बनना नहीं,
आओ सदी के अंत की क्रांति तुम्हें बुला रही,
स्वप्न मुक्ति का तुम्हें एक और है दिखा रही।

इस स्वप्न को साकार तुम्हें कर के दम लेना है,
जो गौरव है खो चुका वापस फिर लेना है।

Monday, October 14, 1996

दिल और दिमाग़

"चल बारिश में भींगे", दिल ने कहा।
दिमाग़ बोला, "भीगे कपड़े सुखाओगी कहाँ?"
दिल के फ़ैसलों को हमेशा दिमाग़ रोकता है,
जबकि दिल पहले से है, दिमाग़ समय के साथ हुआ।

दिल चाहता है कल्पना की ऊँची ऊँची उड़ाने भरना,
दिमाग़ चाहता है पहले रक्षा कवच बनाना।
दिल चाहता है मौज मनाना,
दिमाग़ चाहता है भविष्य बनाना।

दिल-दिमाग़ के इस संघर्ष में जब-जब दिमाग़ विजयी घोषित हुआ है,
एक नया सितारा सभ्यता का उदित हुआ है।
उस-उस समय मनुष्य ने प्रगति की है,
और अपने दुश्मनों की दुर्गति की है।
तब-तब उसके माथे पर शोहरत का टीका चमका है।
तब-तब क्रांति की कांति से वह तेजस्वी और दमका है।

लेकिन जब-जब वह दिमाग़ दिल पर हावी होता जाता है,
तब-तब मानव मानवता की पहचान खोता जाता है।
उस समय किसी कवि का उदर अपनी ही कविता को खा जाता है,
अपने गानों को कोई गायक तब ख़ुद ही भूल जाता है।

तब आदमीयत का क़त्ल होता है, इंसानियत की जाती है जान,
एकादशी आती नहीं, चैन से सोते हैं भगवान।
तब भावनाओं का रह नहीं जाता है कोई मूल्य,
और तब तब यह धरती हो जाती है नर्क तुल्य।
तब-तब भावनाओं पर की चोट से भड़कती है प्रकृति के क्रोध की चिंगारी,
तब उस गर्मी में पिघल जाती है पृथ्वी पर की बर्फ सारी।
तब आता है प्रलय का काल,
करने को पृथ्वी का संहार।
फिर होता है वाराह अवतार,
करने को पृथ्वी का उद्धार,
कोई एक मनु बचता है,
विश्व एक नया रचता है।

फिर दिलयुक्त, दिमाग़हीन मानव आता है,
कुछ दिन शांति के गीत गाता है,
और फिर जब वह दिमाग़ पाता है,
यही इतिहास खुद को दोहराता है।

Friday, October 04, 1996

बादल से आग्रह

ओ बादल! हार मानी है तुमसे कई रवियों ने,
महिमा गाई है तुम्हारी कई कवियों ने।

सुना है कि एक बार एक प्रेमी का व्यथा,
सुनाई थी जाकर उसकी प्रेमिका को उसकी कथा,
आज मैं भी अपना एक संदेश विश्व को सुनाना चाहती हूँ,
और उस संदेश के वाहक के रूप में तुम्हें पाना चाहती हूँ।
जाओ, आज दुनिया वालों को मेरा संदेश दे दो,
"दुनिया वालों! भावी पीढ़ीयों को उनके प्रेम-पूरित देश दे दो।"
उनसे कहो कि हैवानियत की राह से वापस हो जाएँ,
उस वक़्त से पहले जब इन्सानियत सो जाए।

मेघ! तेरे जल की तुलना लोगों ने आँसू से की है,
देख ले आज इन आँखों में आँसू भी हैं,
आ, मेरी आँखों के आँसू ले ले,
और वर्षा के द्वारा पूरी दुनिया को दे दे,
मानवता की विदाई पर निकलने वाले10
आँसू से तू पूरी दुनिया ही भिगो दे।
जा हवा के साथ तू मानवता की ओर,
और लाकर वह उपहार मानवों को दे दे।

Thursday, October 03, 1996

मुझे किसी अनजान की याद आती है

कौन कहता है कि अनजान व्यक्ति महत्वहीन है?
उसका महत्व उससे पूछो जो कि ग़मगीन है।

जब जब ग़मों में डूबी रहने पर भी
चारों ओर से मुसीबतें ही आती हैं,
तब तब किसी सच्चे साथी की खोज में
मुझे किसी अनजान की याद आती है।

जब जब जीवन में भटकाव महसूस होता है,
और फिर सँभलने की बारी आती है,
तब तब मजबूत सहारे की खोज में
मुझे किसी अनजान की याद आती है।

जब जब सर पर किसी का हाथ नहीं होता
और जीवन की धूप तेज हो जाती है,
तब तब एक शीतल छाया की खोज में
मुझे किसी अनजान की याद आती है।

जब जब ज़िन्दग़ी को ढोने में
कंधों की शक्ति क्षीण हो जाती है,
तब तब मजबूत कंधों की खोज में
मुझे किसी अनजान की याद आती है।

जब जब कोई गलत राह चुन जाती हूँ
और आत्मा ख़ुद की ही धिक्कार पाती है,
तब तब हार्दिक सांत्वना की खोज में
मुझे किसी अनजान की याद आती है।

जब जब मेरी आत्मा और इन्द्रियाँ
समाज के विपरीत चलना चाहती हैं,
तब तब एक सही सलाहकार की खोज में
मुझे किसी अनजान की याद आती है।

जब जब किसी से डरकर सहमकर
आत्मा ठिठक कर खड़ी रह जाती है,
तब तब आंतरिक शक्ति की खोज में
मुझे किसी अनजान की याद आती है।

Monday, September 30, 1996

गुलाब

वह नन्हा अमरीकन बना था हमारे लिए शो-पीस
उसे दिखाने के लिए ला रहे थे एक-दूसरे को खींच-खींच।

वह भोला अज्ञान नहीं जानता था, यह उसके जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना है,
वह उस धरती पर खड़ा है, जिसके नाम को उसके नाम से कभी नहीं हटना है,
वह धरती जिसे उसके पूर्वजों ने बसाया है,
न जाने सुकर्म से या कुकर्म से उसने इसे गँवाया है।

अभी तो उसकी वाणी प्रस्फुटित नहीं हो रही थी,
पर उसकी हरकतें संकेतों में मुझसे कह रही थीं,
वह डर रहा था काले भारतीयों से,
उसे अपनापन मिला था सफ़ेदपोश विज्ञान-रथियों से।

मैं नहीं जानती कि कल उसे भारतीय होने की शर्म होगी या नहीं,
पर मानती हूँ कि भारतीयता की भावना उसमें रहेगी नहीं,
आज वह भाषा की दीवारों से मुक्त है, पर कल वह हिन्दी नहीं जानेगा,
जहाँ उसके पिता की प्रतिभा उपेक्षित हुई उसे वह मातृभूमि नहीं मानेगा।
आज उसे अपनी मिट्टी का अन्न मिला है, कल को वह उसे याद नहीं रहेगा,
उसकी भावनाएँ यह समझने में असमर्थ हैं कि देश से दूर मिट्टी में वह स्वाद नहीं रहेगा।
कोई अचरज नहीं उसे 'माँ' का अर्थ 'मम्मी' बताया जाएगा,
'माँ' सा पवित्र और अपना शब्द उसे नहीं भाएगा।
और अपनी जड़ों से दूर वह गुलाब 'चाइनारोज' बन जाएगा,
रंग-रूप पा जाएगा, पर भारतीयता की सुगंध नहीं ला पाएगा।
एक पत्ती की कद्र न होने से एक गुलाब देश से दूर हो जाएगा,
यह किसी एक की कहानी नहीं, ऐसा रहा तो कोई नहीं बच पाएगा।
और एक दिन हर एक भारतीय इंगलिश या अमरीकन कहलाएगा।

Monday, September 23, 1996

अंतरिक्ष में मानव

इस विषय पर सोचते हुए अचानक याद आया,
कभी किसी कवि ने क्या खूब था गाया।

उन्होंने कामना की थी,
'चढ़ जाएँ धरा से सूर्य किरण पर राग-रथी'

और आज का मानव करने जा रहा है वह आकांक्षा पूरी,
किरणों को तो पा चुका, सूर्य से भी नहीं है ज़्यादा दूरी।
कौन मानेगा, यह मानव कभी था इस धरती से अंजान,
अब तो अंतरिक्ष भी बन गया उसके लिए पिकनिक का स्थान।

अपनी हर दिन बढ़ती प्रगति से वह खुश हो रहा है,
बेख़बर कि इन कलापों से कोई रुष्ट हो रहा है,
वह जिसने बनाई सृष्टि,
जी हाँ! वह है हमारी प्रकृति।

अरे ओ अंतरिक्ष में जाते मानव!
सूर्य की ओर क़दम बढ़ाते मानव!
भूलना नहीं सूर्य-ताप से तू नष्ट भी हो सकता है,
अंतरिक्ष की ख़ातिर धरती को भूलने का तुझे कष्ट भी हो सकता है।
अंतरिक्ष का खिलाड़ी बनने वालों! तुम शायद चैन से जियोगे-मरोगे,
पर भावी पीढ़ी की भी सोचो, उसे तुम क्या दे सकोगे?

वायु-जलहीन अंतरिक्ष में घर?
घुटता-सा जीवन कष्टों में घिरकर?

आज अंतरिक्ष तुम्हें खिलौना भले लगे, पर कल ये तुम्हें खिलवा सकता है,
भूलो मत! प्रकृति का अंग है, छेड़ोगे तो दंड दिलवा सकता है।
मैं यह नहीं कहती कि अपनी प्रगति रोको,
पर अंतरिक्ष के पहले धरती के भूखों को देखो।

क्या दोगे तुम उन्हें अंतरिक्ष अभियानों से?
पृथ्वी पर घर-विहीनों को अंतरिक्ष के मकानों?

जिस दिन तुममें ताकत आ जाए, नई ओजोन बना सको,
उस दिन अंतरिक्ष का रुख करना, भयमुक्त हो इसे मिटा सको।

जिस दिन यह निश्चित कर लो, मानव अंतरिक्ष को बाँटेगा नहीं,
वहाँ जाकर पृथ्वी के समान अपनों को काटेगा नहीं,
उस दिन वहाँ जाना और गर्व से पुकारना, "देवता और दानव!
मानव का नहीं कुछ बिगाड़ सकते तुम क्योंकि अब है अंतरिक्ष में मानव।"

Saturday, September 21, 1996

कहाँ गया देवत्व हमारा

पापों में डूबी धरती को फिर ज़रूरत है वाराह अवतार की,
मानवता के शत्रुओं के लिए ज़रूरत है तांडव-युक्त हुंकार की,
फिर धरती चाहती है अपनी संतानों के लिए महासंबोधि,
फिर आज ज़रूरत है इस ज्ञान से मानव धर्म प्रसार की।

ज़रूरत है एक बुद्ध की जो मानवता का घूँट पिला सके,
और बलशाली राम चाहिए, सैकड़ों रावणों को हिला सके,
शासक-शासित को कर्तव्यों के बोध के लिए
चाहिए एक और चाणक्य जो जीवन राह बता सके।

चाहिए कृष्ण एक और ताकि पांडव विजयश्री पा सकें,
और चाहिए एक विश्वामित्र धरती पर स्वर्ग बना सके,
कोमलता को कायरता में परिणत करने वालों को
बनना होगा दुर्वासा, क्रोध की चिंगारी को आग बना सके।

चाहिए हमें एक और भरत, सिंह के दाँत गिना सके,
और चाहिए एक मौर्य जो सेल्यूकस को हरा सके,
सारे विश्व में घूम-घूम, लेकर ज्ञान मशाल
विवेकानंद चाहिए विश्व-विजयी कहला सके।

थे सब भारतवर्ष की थाती और अलौकिक गुण था पाया,
देवताओं का अंश है हममें यह सिद्ध कर के था दिखलाया,
कहाँ गया देवत्व हमारा? दानवों ने लेकर सहारा,
हमारी दानवी प्रकृति का, हमें अपनी राह से भटकाया।

हो चुके हैं इस धरती पर अत्याचारी नंद अनेकों,
पर हमने तो उन सबका सामना कर के दिखलाया,
कहाँ आज का है चन्द्रगुप्त, भारतीयों खोजो-देखो,
एक समय में इसी भूल से हमने अपना देश गँवाया।

नहीं मिलेगा कोई तुम्हें यहाँ अलौकिक शक्ति वाला,
बनना होगा तुमको ही मानवता का रखवाला।
कोई फ़ायदा है नहीं, डूब चुका है देश गर्त में
कहकर हमने अपनी इस ज़रूरत को खुद ही टाला।

क्यों नहीं बन सकते हैं हम राम, कृष्ण या बुद्ध महान्?
मानव के लिए कुछ भी नहीं असंभव, फिर क्या हैं हम इतने अज्ञान?

Thursday, September 19, 1996

सभ्यता का चरमोत्कर्ष

मंद-मंद हलकी-हलकी बहती हवा
ने कानों में आकर मुझसे कहा,
"चल मैं ले चलूँ तुझको,
तू जाना चाहती है जहाँ।"

मैंने कहा,"ऐ हवा!
तू तो घूमती यहाँ-वहाँ,
बता कोई ऐसी जगह,
शांति पा सकूँ मैं जहाँ।"

गम्भीर होकर उसने कहा,
"प्रगति की अंधी दौड़ है जहाँ,
भला उस भावना-शून्य दुनिया में,
शांति मिलेगी तुझे कहाँ?"

हताश होती हुई मैं बोली,
"क्या तुझे ऐसी जगह न मिली?
भले वह इस पृथ्वी से बाहर हो,
पर खिलती हो जहाँ शांति की कली।"

जवाब मिला, "ऐ नादान!
क्या सचमुच तू है अनजान?
चाँद पर भी मानव का कब्ज़ा है अब,
छोटा-सा मसला है अब यह जहान।"

"निकट भविष्य में चाँद में
तरलाई न होगी, न मन में
आएगी शांति की बात।
कोई मज़ा ना होगा जीवन में।"

"तब सभ्यता के चरमोत्कर्ष पर पहुँच
होगी तू भी दासी विज्ञान की
रक्षा के कवचों में घिरकर भूल जाएगी,
बात तू भी प्रकृति के गुनगान की।"

Tuesday, September 17, 1996

काग़ज़ की जीवन कहानी

बाँस की पेड़ जिसमें, छिपा है भविष्य के काग़ज़ का टुकड़ा,
दिखते हैं कुछ मज़दूर और नज़र आता है एक मालिक-सा मुखड़ा।
फिर दनादन चलती है कुल्ड़ियाँ,
कुचली चली जाती हैं पास की झाड़ियाँ।
फिर वे बाँस ले लेते हैं लुग्दी का रूप,
हरे-हरे से प्यारे बाँस लगने लगते हैं ब़ड़े कुरूप।
फिर बन जाता है वो काग़ज़,
लेकर थोड़ा-सा श्रम, थोड़ी-सी लागत।
फिर वह एक मोटी-सी कॉपी का भाग बन जाता है,
एक बड़ी ऑर्केस्ट्रा का छोटा-सा साज बन जाता है।

फिर दुकान के एक कोने में उसपर धूल जम रही थी,
यदि उसमें प्राण मानें तो उसकी साँस घुट रही थी।

फिर एक दिन एक विद्यार्थी ने उसकी उपयोग किया,
कुछ लिखकर, कुछ काटकर, कुछ करने में प्रयोग किया।

फिर एक दिन रह गया वह एक रद्दी काग़ज़,
कूड़ेदान में होने भर की रह गई उसकी हैसियत।

पर क़िस्मत से उसे एक दुकानदार ने ले लिया,
एक बच्चे के खरीदने पर कुछ बिस्किट उसमें दे दिया।

बच्चे से छूटने पर कर्मचारी के झाड़ू का हो शिकार,
चल दिया म्यूनिसिपल्टी की गाड़ी में होकर सवार।

कहीं किसी गढ्ढे में सड़कर खाद बन गया,
जिसे किसी माली ने अपने बाँस के पेड़ में डाल दिया,
और फिर खत्म हो गई उसकी जीवन कहानी,
बाँस के उस पेड़ के रूप में रह गई उसकी निशानी।

उसे किसी माली ने पोसा,
उसे किसी फैक्ट्री ने खोजा,
किसी विद्यार्थी ने उसे पूजा।
जाने किसी नादान को क्या सूझा?
उसे बना डाला कूड़ा,
हो गया उसकी जीवन पूरा।

किस्मत ने जीवन के कितने रंग दिखाए,
सहता गया वह काग़ज़ चुपचाप,
जिसने उसे जीवन झेलने की
शक्ति दे दी अपने आप।