Friday, September 13, 1996

अतीत, हक़ीकत और स्वप्न

एक हक़ीकत क्षण में अतीत हो जाएगी,
उसे वापस लाने की बात आशातीत हो जाएगी,
एक सपना क्षण भर में शायद सच हो जाएगा,
'कभी वह सपना था' - यह भाव कहीं नहीं बच पाएगा।

और फिर एक दिन ऐसा आएगा,
जब स्वप्न और अतीत की भूल-
भुलैया में, मानव विलीन हो जाएगा,
इन सबका अंत हो जाएगा।

फिर नए सपने होंगे, फिर नई हक़ीकत,
विधाता रचेगा फिर से, कुछ नई-नई सी क़िस्मत,
उनके नए सपने मानव को अतीत की ओर झुकाएँगे,
और वे हक़ीकत के लिए अतीत को खोज लाएँगे।

फिर जोड़े जाएँगे वे घड़े,
जिन्हें तोड़ा था किसी बड़े,
आदमी के निर्मम हाथों ने,
नहीं जुड़ने दिया गरीबी के आघातों ने,

फिर सूतों और रेशम के अवशेषों से
पता लगेगा सामाजिक विषमता का।
और अतीत के विकृत समाज की दुहाई देकर,
वो नारा लगाएँगे समता को।

फिर एक दिन अतीत खोजने वाले अतीत बन जाएँगे,
फिर कुछ नए सपनों के सौदागर,
बनाएँगे सपनें के सुंदर घर।
और अपने अतीत को ढूँढ़ लाएँगे।

स्वप्न और अतीत की यह कहानी युगों-युगों तक चलती रहेगी
कहानी हक़ीकत की बनती रहेगी, बिगड़ती रहेगी,
अतीत और स्वप्न आते-जाते रहेंगे,
स्वप्न-द्रष्टा अतीत बन जाते रहेंगे।
लोग आते रहेंगे, लोग जाते रहेंगे।

Monday, September 02, 1996

तुम इंसान हो

क्यों मानते हो अपना देश एक छोटी सी धरती,
क्यों नहीं चाहते वह भूमि जो कोटि-कोटि के दामन भरती,
क्या मिलेगा तुम्हें इस स्वर्ग को उजाड़कर,
जगत्-गुरु होने का गौरव नकार कर?
कब मिल सकेगा तुम्हें उन शहीदों-सा मान,
जिन्होंने तुमसे ही उलझते हुए दे दिए अपने प्राण?
वे शायद आभारी हैं तुम्हारे कि तुमने उन्हें मान दिया,
पर, आख़िर क्या चाहते हो जो हर बहन को रुलाने का काम है ठान लिया?
ज़रा सोचो उस बेचारी बहन की कथा,
जो राखी के दिन मना रही है भाई के मौत की व्यथा।
ज़रा सोचो उस स्त्री का करुण कहानी,
जिसे एक वर्ष में हटानी पड़ी है सुहाग की निशानी,
जो ससुराल के लिहाज से रो भी नहीं पा रही,
उसकी आह महसूस करो जो तिल-तिल कर है कराह रही।
सोचो उस माँ के बारे में जिसके आगे बच्चे की लाश पड़ी है,
अविश्वस्त-सी जिसकी आखें उस लाश पर ही गड़ी हैं।
उस पिता के हृदय की सोचो, जिसके पास बेटे की चिता सजी है,
कितना बदनसीब है वह कि उसके रहते बेटे को आग पड़ी है।
कौन है इस स्थिति का आधार?
कौन है इसका ज़िम्मेवार?
कभी तरस, तो कभी हँसी आती है तुम्हारे विचार पर,
कौन-सा गौरव चाहते हो इस गौरवमयी धरती को त्याग कर?

ऐ इन्सान, कहाँ खो गई तेरी इन्सानियत?
आदमी! किस ताक पर रख छोड़ी तूने आदमीयत?

क्यों मिटाना चाहते हो यहाँ से मोहब्बत का निशाँ,
कभी प्रेम से बोलो तो देखो कैसा बँधता है शमाँ।

इस धरती को स्वीकारो,
यों भाइयों को मत मारो,
देखो तो कितना कुछ है यहाँ तुम्हारे लिए,
'मेरा' छोड़ कहना सीखों 'हमारे' लिए।
फेंक दो यह घिनौना मवाद,
जिसे कहते हैं हम आतंकवाद,
इसके कारण अब ना किसी की माँग का सिन्दूर मिटे,
ना ही अब किसी बहन के हाथ से राखी छूटे।

लेकिन मेरी कलम कल्पना-लोक में जा रही है,
क्योंकि तुम्हारी आत्मा मेरी पुकार नहीं पा रही है,
या तुम एक सच्चाई से मुँह मोड़ना चाहते हो,
बेवज़ह अपना अद्भुत घर ख़ुद ही तोड़ना चाहते हो?
अपनों की आवाज़ की अवहेलना तो पशु भी नहीं करता,
तो क्या तुम्हें इन्सान की पुकार में अपनापन नहीं मिलता?

सोचो कि तब तुम एक पशु भी नहीं रह गए,
क्योंकि तुम्हारे जीवन-मूल्य नफ़रत की धारा में बह गए।
क्या कंधे पर बंदूकों के साथ तुम्हें अपना अस्तित्व नज़र आता है?
क्या अपने चेहरे पर इंसानी व्यक्तित्व नज़र आता है?

यदि हाँ, तो तुम्हारे दिल का आईना झूठा है,
क्योंकि हर सही इंसान विश्व का तुमसे रूठा है।

अब तुम ही सोचो नफ़रत ने तुम्हें क्या बना दिया है?
कि तुम इंसान हो, यह तक तुमने भुला दिया है।

Monday, August 26, 1996

ज़िन्दग़ी

ज़िन्दग़ी
एक सुहाना सफ़र,
या तनावों का घर?

ज़िन्दग़ी
एक ख़ुशनुमा स्वप्न,
या एक ख़वाब जिसमें भरा हो ग़म?

ज़िन्दगी
प्यार का गीत,
या दुखों का मीत?

ज़िन्दग़ी
एक लाभदायक समझौता,
या सपनों का टूटा घरौंदा?

ज़िन्दग़ी
पूरी होती चाह,
या एक कठिन राह?

ज़िन्दग़ी
त्याग और बलिदान,
या ज़रूरत से ज़्यादा खिंची कमान?

ज़िन्दग़ी
खुशियों का पैग़ाम,
या ग़मों की दास्तान?

ज़िन्दग़ी
क्या?
आख़िर क्या?

Sunday, August 18, 1996

राष्ट्र प्रेम - मानव प्रेम

खाकी वर्दी पहन कर गांधी टोपी चढ़ा लेना,
राष्ट्रगान गाते हुए तिरंगा फहरा लेना,
क्या यही राष्ट्र-प्रेम है?

'नारी मुक्ति' पर भाषण देकर घर में बेटियों को दबा देना,
आर्थिक सुधारों के दस्तावेज़ों के पीछे घोटालों की पंक्ति लगा देना,
क्या यही राष्ट्र-प्रेम है?

झोपड़पट्टियाँ गिरवा कर फैक्ट्रियाँ बनवा देना,
स्वतंत्रता दिवस पर अतीत का गुनगान गा देना,
क्या यही राष्ट्र-प्रेम है?

विदेशियों के आगमन पर तोपें छुड़वा देना,
और गांधी जयंती पर 'मेरा भारत महान्' बुलवा देना,
क्या यही राष्ट्र-प्रेम है?

मानवाधिकारों पर बल देते हुए बच्चों से श्रम करवा लेना,
निरीहों का उत्थान करते हुए उनके वोट गिरवा देना,
क्या यही मानव-प्रेम है?

शांतिदूत बनते हुए दो भाइयों के लड़वा देना,
'सेकुलरों' द्वारा अस्सी प्रतिशत आरक्षण करवा देना,
क्या यही मानव-प्रेम है?

बाढ़-ग्रस्त क्षेत्र का निरीक्षण कर अपना मन बहला लेना,
सूखा-ग्रस्त क्षेत्र की सहायता राशि खुद ही पचा लेना,
क्या यही मानव-प्रेम है?

सौंदर्यीकरण के नाम पर लाखों की रोटी छुड़वा देना,
और घंटे भर बाद खुद को गरीबों का मसीहा कहा देना,
क्या यही मानव-प्रेम है?

या कि हर मानव की सेवा में खो जाना
उस कदर कि उसमें खुद को ही बिसरा जाना
सिद्धांतों से हटकर इस राष्ट्र को यथार्थ पर लाना
अंधविश्वासों की चादर हटा कर सोई जनता को जगाना
दूसरों के कष्टों के प्रति भावुक हो जाना,
न कि अपनी भावनाओं को दूसरों पर थोप जाना
इस राष्ट्र को संकटों को सचमुच में अनुभव कर पाना
न कि लोकनिंदा के भय से नाटकीय आह भरकर रह जाना
यही राष्ट्र-प्रेम है?
हाँ,
यही राष्ट्र-प्रेम है,
यही मानव-प्रेम है,
यही धर्म-प्रेम है,
यही कर्म-प्रेम है,
यही सही ज़िन्दग़ी है,
यही सही बन्दग़ी है,
इन्सान के लिए यही सही मोहब्बत है,
जिससे ज़िन्दग़ी रहते मिल जाती जन्नत है।

Saturday, July 27, 1996

नारी मुक्ति

नारी मुक्ति का एक सुनहरा स्वप्न,
उसकी आशा भरी आँखों में था बंद।
दुनिया की नज़रों में वे आँखें खुली थीं,
पर, वह नारी थी, जिसे आँखें बंद करने के लिए ही मिली थीं,
फिर भी मुक्ति के बल पर,
परंपराओं से लड़ किसी तरह अधखुली थीं।

वह दो नावों की अकेली नाविक और सवार,
आख़िर कब तक ना माने ज़िन्दग़ी से हार?
सोचती कि काश! नारी मुक्ति का स्वप्न न पाला होता,
कम-से-कम कोई दया तो करने वाला होता।

पर अब तो न सहयोग है, न दया की भीख,
हर देने वाला दे कर चला जाता है कोई सीख।
उससे घर को आराम चाहिए,
उससे बाहर को काम चाहिए,
काम, काम, काम है उसकी दिनचर्या
चाहे दफ़्तर की कुर्सी हो या हो घर की शय्या।

लड़के वाले देखने आए,
रूप गुण तो खूब भाए।
लड़की नौकरी-पेशा है, ये तो हमें चाहिए,
पर एक और सवाल का भी तो जवाब लाईए,
"लड़की को और क्या-क्या सिखलाया?"
जी हुआ पलट के पूछे, "लड़के को है क्या बतलाया?"
पर क्या आपका दिमाग़ हुआ है ख़राब?
आप लड़की हैं, भूलें मत, वह लड़का है जनाब।

और फिर पत्नी, बहू, माँ और नागरिक बन,
हर जगह उत्तरदायित्वो का कर वहन,
छोड़ गई इस समाज के लिए एक प्रश्न-
क्या नारी मुक्ति नहीं एक और बहाना करने का दोहरा शोषण?

Monday, June 24, 1996

कल्पनाएँ

निरुत्तर रहना पड़ता है इस प्रश्न पर कि कल्पनाओं में क्यों हो जीती,
अब क्या बताऊँ कि यथार्थ नहीं जो दे पाता, वह कल्पनाएँ ही तो हैं देती।
माना कि कोरी कल्पनाओँ से चलता नहीं जीवन है,
पर कम-से-कम सुखी जीवन का तो मिलता एक आश्वासन है।
कल्पनाएँ और कुछ नहीं तो एक सुखद अहसास होती हैं,
जब दिल टूट जाते हैं तो उनकी एकमात्र बची आस होती है।
कल्पनाओं में सचमुच बड़ा ही बल है,
ये दुखियों को भी देतीं जीने का संबल है।
कल्पनाएँ यथार्थ की भी पूरक हैं,
जब यथार्थ से जी घबराए तो बचने की एकमात्र सूरत हैं।
यथार्थ का सामना करने हेतु ऊर्जा-स्रोत कल्पना है,
ये अहसास कराती हैं कि जीवन में कुछ तो अपना है,
क्योंकि यथार्थ तो अपना हो नहीं सकता,
तो कम-से-कम कल्पनाएँ कोई खो नहीं सकता।

तो कल्पना में हम डूब नहीं सकते, पर कल्पना करना नहीं बुरा है,
यथार्थ से उसे अलग नहीं कर सकते, दोनों में एक संबंध जुड़ा है,
आज के यथार्थ में कोई भी पागल हो जाए,
यदि वह जीवन में कभी कल्पनाओं का सहारा न पाए।

Saturday, June 15, 1996

समाज का पोस्टमार्टम

मैं एक डाक्टर के वेश में,
जुटी हुई थी एक गंभीर केस में,
एक रोगी समाज नाम था जिसका,
जाने उसे रोगी बनाने का काम था किसका?
एक साथ कई बीमारियों से ग्रस्त था,
अपनी दयनीय हालत से वह त्रस्त था,
पर यह क्या! वह तो मर चुका था,
यमदूत मुझसे पहले ही अपना काम कर चुका था,
पोस्टमार्टम से पता चला, कई बीमारियाँ थीं उसे,
वह 'लावारिस' लाश सौंपती भला मैं किसे?
उसकी त्वचा का रोग था भ्रष्टाचार,
दिमाग़ ख़ुद से निकाल चुका था शिष्टाचार,
हिंसा, स्वार्थ और दूसरों के खून से भर,
फट चुका था उसका ब्रेन-ट्यूमर।
दानव का रक्त भरने से उसे हो गया था ब्लड कैंसर,
परोपकार रूपी हृदय के खत्म होने से वह गया था मर।
उसकी ज़बान में भी था रोग,
जो त्याग छोड़ चाहती थी सिर्फ़ भोग।
पैर नहीं टिक सकते थे ज़मीन पर,
उन्हें बीमारी थी चलने की खून पर।
हाथों की बीमारी, वे काम न कर सकते थे
बस काम तमाम कर सकते थे।
उसकी सिरदर्द थी संस्कृति,
पेट में दर्द का कारण थी प्रकृति।
अनास्था का अपेंडिक्स उसे शूल सा चुभता था,
अपनी दशा से वह मन-ही-मन कुढ़ता था,
फिर भी बीमारियों के पथ से नहीं मुड़ता था,
बंदूकों पर हो सवार क्षय रोग की उड़ान भरता था।
ऊपर-ऊपर मीठी बोलने से उसे हुई थी शुगर की बीमारी,
उसकी कुटिलता रूपी बीमारी के आगे ईश्वर की शक्ति भी हारी,
ब्रेन कैंसर ने भी उसका पीछा न छोड़ा था,
आख़िर ख़ुद उसने ही तो ख़ुद को उस ओर मोड़ा था।

इस दास्तान को सिर्फ कविता समझ कर भूल न जाना,
ख़ुद को ऐसी राह पर कहीं से भटक-भूल न लाना,
वर्ना तुम्हारे पोषक समाज का हश्र यही होगा,
उस पेड़ की शाख होने का कष्ट तुम्हें भी होगा।

Thursday, June 13, 1996

आदमी की तलाश

यहाँ हर किसी को किसी की तलाश है,
हर किसी को किसी की लगी एक प्यास है,
एक 'विवेकशील' प्राणि,
नाम जिसका है आदमी,
उसे आखिर किसकी तलाश है?
वह किसके लिए लगाए एक आस है?
किसके लिए वह ऐसे पथ पर बढ़ रहा है,
जहाँ मानव, मानव से ही मर रहा है,
जहाँ उसे मालूम ही नहीं वह कैसे कर्म कर रहा है,
और बिन मंज़िल के ही रास्ते पर बढ़ता चल रहा है।
यह उस पर सवार कैसा जुनून है,
जो से लेने नहीं देता सुकून है?
क्या मिल रहा है या मिलेगा उसे यह सब कर के?
अच्छा हो यदि वह इसका भी जवाब सोच ले।
वह दुनिया जहाँ न प्यार हो न जज़्बा,
न हो समाज, न गाँव, शहर, न कस्बा,
बस बंदूक ले कर मारने पर उतारू मानवों का ढाँचा,
सच्चे मानव बनाने वाला टूट चुका होगा साँचा।
वहाँ न बहन की प्यारी झिड़की होगी, न माँ का ममता,
बंदूक की सम्पत्ति रखने वाले मानवों के बीच होगी अर्थ की समता।
वहाँ न होगी बच्चों की शरारत,
न ही जीवन निर्वाह की कोई हरारत।
हर किसी के हाथों कोई जीवन नष्ट हो रहा होगा,
और सत्कर्म बेबस पड़ा, इस सृष्टि से रुष्ट हो रहा होगा।
वहाँ छात्र बंदूक संस्कृति को सही मानेंगे,
'स्व' की परिधि से निकलने की कला को नहीं जानेंगे।
वह मानव, मानव नहीं, पृथ्वी पर दाग होगा,
नर के वेश में पृथ्वी पर विचरता बाघ होगा।

Monday, June 03, 1996

शिष्टाचार महान् है

शिष्टाचार,
सभ्य जीवन की आधार,
भला क्या है उसमें?
उसका सही रूप पाते हैं किसमें?
जिसके पास सबसे बड़ा झूठ-फ़रेब है,
वह ऐसा है जैसा अन्दर से सड़ा, ऊपर से लाल सेब है।
..................................... क्यों?
इसका भी जवाब लो।

एक व्यक्ति निरभिमानी,
जी हाँ, शिष्टाचार का धनी।
कोई पढ़ सके तो पढ़ ले उसका मन,
क्या सचमुच उसमें नही अभिमान?
है, मगर फिर भी वह शिष्ट है,
और यह समाज उससे नहीं रुष्ट है,
जो दिल की बात छिपा झूठ में खुद को तुच्छ कहता है,
और यह समाज दिल खोलकर रखने वालों से रुष्ट रहता है।

एक व्यक्ति निःस्वार्थी,
शिष्ट और परमार्थी।
क्या है उसमें परमार्थ सही?
क्या सचमुच उसमें स्वार्थ नहीं?
निःस्वार्थी बनने पर समाज में मिलती इज्जत का भी नहीं?
उस लोक में जाने पर ईश्वर की मोहब्बत का भी नहीं?
बेशक़ यह भी है ख़ुदगर्ज़ी,
पर समाज के लिए ये है इन्सानियत की मर्ज़ी।

लेकिन........................................ फिर भी

यह शिष्ट आचार है,
सभ्य जीवन की आधार है,
बग़ैर इसके जीवन निराधार है,
एक हद तक सत्य का बलिदान है,
फिर भी मानते आए हैं, और ज़बर्दस्ती भी मानना पड़ेगा,
शिष्टाचार महान् है।

Wednesday, May 15, 1996

एक भयावह सपना

मैं थी एक कमरे में बंद
मेरे सामने न था कोई रंग,
न ही था कोई मेरे संग।

मैं न सूर्य को देखती थी न तारों को,
क्योंकि शायद भुला भी चुकी थी "असभ्यता" की मजारों को,
मैं तो उनके नाम भी न जानती थी,
उस कमरे को ही सारी दुनिया मानती थी।

"खट-खट" - दरवाज़े पर शायद आया कोई चोर,
पर सुरीली आवाज आई, "नहीं, मैं हूँ एक मोर।"
तुम नहीं जानती? प्रकृति का दूत।
सच चौंक गई मैं, कौन है यह भूत?

डरते-डरते दरवाजा खोला,
उस खूबसूरती को देख कर मेरा मन डोला।
पर कुछ समझ नहीं आया,
तब उसने मुझे खुला पंख दिखाया।

अब मैं उन पंखों पर हो सवार, शायद अतीत में उड़ी जा रही थी,
और खुद को कुछ अजीब हरे-भूरे प्राणियों के बीच पा रही थी।
और थे कुछ चलते उड़ते प्राणि,
बिना कवच के ही फिरते प्राणि।

आश्चर्य में मैंने पूछा,
"भाई! बताओ तो ये है क्या?"
उसका जवाब था, "प्रकृति"
ये थी भला कैसी अजीब सृष्टि।

अचानक मुझे एक झटका लगा,
किसी की चुहल का खटका लगा।
ओह! तो यो एक भयावह सपना था,
पर हमारे कितना करीब, कितना अपना था।
हमारा भविष्य ऐसा ही घुटता हुआ,
खुद से और सिर्फ खुद से लिपटा हुआ।

तभी तो मैंने भविष्य में भी खुद को देखा,
जबकि मेरे ख़्याल में कदापि संभव नहीं ऐसा
कि मैं उस भविष्य में रहूँ,
और उन परिस्थितियों को सहूँ।

पर भावी पीढ़ी को ही सही! यह भविष्य देगा कौन?
हम ही तो, इस सवाल पर आप सब क्यों हैं मौन।